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कलश स्थापना में आम्रपल्लव और नारियल का विशेष महत्व, मंगल और समृद्धि का माना जाता है प्रतीक

रणविजय/पौआखाली

कलश स्थापन के साथ ही नौ दिवसीय नवरात्र का महोत्सव आज से प्रारंभ हो गया है. पौआखाली नगर के दो प्रमुख स्थानों सार्वजनिक दुर्गा मंदिर एवम मेला ग्राउंड दुर्गा मंदिर समेत खानाबाड़ी दुर्गा मंदिर, सरायकुड़ी दुर्गा मंदिर, रसिया बाजार दुर्गा मंदिर समेत ठाकुरगंज प्रखंड के विभिन्न हिस्सों में कलश स्थापन के साथ आज से माता के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा उपासना पूरी श्रद्धा भक्ति के साथ शुरू हो गई है.


पौआखाली सार्वजनिक दुर्गा मंदिर में पुरोहित वेदानंद पाठक ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ कलश स्थापन का शुभ कार्य संपन्न किया. शारदीय नवरात्र के अवसर पर कलश स्थापना को धार्मिक अनुष्ठान की महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है. कलश में जल भरकर उसके ऊपर आम्रपल्लव और नारियल स्थापित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. मान्यता है कि कलश में देवी-देवताओं का वास होता है और इसके माध्यम से घर-परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का आह्वान किया जाता है.

आम्रपल्लव को माना जाता है जीवन और समृद्धि का प्रतीक

कलश के मुख पर आम के पत्ते लगाने की परंपरा विशेष धार्मिक महत्व रखती है. आम के पत्ते सदाबहार प्रकृति, जीवन शक्ति और उर्वरता के प्रतीक माने जाते हैं. धार्मिक मान्यताओं में आम्रपल्लव को शुभता और मंगल का सूचक माना गया है. कलश में आम के पत्ते लगाने का भाव यह भी है कि प्रकृति और जीवन की ऊर्जा पूजा-अनुष्ठान का अभिन्न हिस्सा बने. आम्रपल्लव की हरियाली नवरात्र में नवजीवन और सकारात्मकता का संदेश देती है.

नारियल में समाहित मानी जाती है शुभता

आम्रपल्लव के ऊपर रखा जाने वाला नारियल भी कलश स्थापना का महत्वपूर्ण हिस्सा है. हिंदू धार्मिक परंपरा में नारियल को श्रीफल कहा जाता है. इसे पवित्रता, समर्पण और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है. नारियल की तीन आंखों को भगवान शिव के त्रिनेत्र से भी जोड़ा जाता है, जबकि इसकी कठोर बाहरी परत और अंदर का श्वेत भाग मनुष्य के बाहरी अहंकार को त्यागकर भीतर की शुद्धता की ओर बढ़ने का संदेश देता है.

कलश बना प्रकृति, शक्ति और समृद्धि का प्रतीक

धार्मिक विद्वानों के अनुसार कलश में जल जीवन का प्रतीक है, आम्रपल्लव प्रकृति और हरियाली का तथा नारियल पूर्णता और शुभता का प्रतिनिधित्व करता है. इस तरह कलश स्थापना केवल एक धार्मिक विधि नहीं, बल्कि जल, वनस्पति और जीवन के आपसी संबंध का भी प्रतीक मानी जाती है. नवरात्र में जब श्रद्धालु विधि-विधान से कलश स्थापित करते हैं, तो इसके माध्यम से मां दुर्गा का आह्वान करते हुए परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना की जाती है.

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