पद्मभूषण बलायचंद मुखोपाध्याय ‘बनफूल’ ने लघुकथा को दी नई धार, उनकी रचनाओं ने साहित्य से सिनेमा तक छोड़ी अमिट छाप
डॉ.मिथिलेश कुमार झा/ कटिहार – गंगा और कोसी के संगम क्षेत्र की धरती मनिहारी ने जिस साहित्यिक प्रतिभा को जन्म दिया। उसने बंगला साहित्य को देश-दुनिया में विशिष्ट पहचान दिलाई। 19 जुलाई 1899 को तत्कालीन पूर्णिया जिले के मनिहारी में जन्मे बलायचंद मुखोपाध्याय साहित्य जगत में बनफूल’ के नाम से विख्यात हुए। आज यह विडंबना है कि जिस महान साहित्यकार की प्रतिभा को भारत सरकार ने पद्मभूषण जैसे देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान से अलंकृत किया। उसी की जन्मभूमि में उनकी स्मृतियों को स्थायी रूप से सहेजने की पहल अब भी अपेक्षित है।
चिकित्सक के रूप में अपना पेशेवर जीवन शुरू करने वाले बनफूल ने साहित्य की लगभग हर प्रमुख विधा में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। कविता से साहित्यिक यात्रा शुरू करने के बाद उन्होंने कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, निबंध और संस्मरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके नाम से उपलब्ध साहित्यिक विवरणों में 500 से अधिक लघुकथाओं,करीब 60 उपन्यासों तथा नाटकों और अन्य विधाओं की बड़ी रचनात्मक विरासत का उल्लेख मिलता है। उनकी कहानियों की विशेषता संक्षिप्तता,तीक्ष्ण सामाजिक दृष्टि, व्यंग्य और जीवन के किसी एक छोटे-से प्रसंग में बड़े मानवीय सत्य को उभार देना रही।
‘स्थावर’, ‘तृणखंड’, ‘जंगम’, ‘अग्नि’, ‘डाना’, ‘कष्टिपाथर’, ‘भिमपलाश्री’, ‘पंचपर्व’, ‘नवदिगंत’ और ‘लक्ष्मी का आगमन’ जैसी रचनाएं उनकी बहुआयामी साहित्यिक प्रतिभा की परिचायक हैं। वहीं ‘बनफूलेर गल्प’, ‘बाहुल्य’, ‘बिंदु-बिसर्ग’, ‘अदृश्यलोके’, ‘अनुगामिनी’, ‘टननी’, ‘नवमंजरी’ और ‘दुर्बीन’ जैसी कहानियों ने बंगला लघुकथा को अलग पहचान दी। उनके लेखन में चिकित्सकीय अनुभव, विज्ञानबोध, मानवीय मनोविज्ञान और सामाजिक जीवन का सूक्ष्म अवलोकन एक साथ दिखाई देता है।
साहित्य से सिनेमा तक पहुंची बनफूल की रचनाएं –
बनफूल की साहित्यिक प्रतिभा का प्रभाव केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहा। उनकी रचनाओं पर कई चर्चित फिल्मों का निर्माण हुआ। मृणाल सेन की 1969 की चर्चित हिंदी फिल्म ‘भुवन शोम’ उनकी कहानी पर आधारित थी। फिल्म ने भारतीय समानांतर सिनेमा की दिशा में महत्वपूर्ण स्थान बनाया। तपन सिन्हा निर्देशित ‘आरोही’ भी बनफूल की कहानी पर आधारित थी। 1964 में बनी इस बंगला फिल्म के लिए स्वयं बलायचंद मुखोपाध्याय को सर्वश्रेष्ठ कहानीकार के लिए राष्ट्रीय स्तर का सम्मान मिला।
फिल्म को भी राष्ट्रपति रजत पदक से सम्मानित किया गया।इसी क्रम में ‘हाटे बाजारे’, ‘एकती रात’, ‘आलोक पिपासा’, ‘अर्जुन पंडित’, ‘तिलोत्तमा’, ‘पाका देखा’ और अन्य फिल्मों में भी उनकी साहित्यिक कृतियों का सिनेमाई रूपांतरण हुआ। इस तरह बनफूल की रचनाएं बंगला साहित्य की सीमा पार कर भारतीय सिनेमा की स्मरणीय कृतियों का हिस्सा बनीं।
भारत सरकार ने भी किया सम्मानित –
बनफूल की साहित्य साधना को भारत सरकार ने 1975 में पद्मभूषण से सम्मानित किया। यह उनके साहित्यिक योगदान की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति थी। इसके अलावा उनकी जन्मशती के अवसर पर 19 जुलाई 1999 को भारत सरकार के डाक विभाग ने उनके सम्मान में 300 पैसे का स्मारक डाक टिकट जारी किया। डाक विभाग के आधिकारिक टिकट कैटलॉग में भी उनके नाम और 19 जुलाई 1999 की तिथि दर्ज है। यह भी उल्लेखनीय है कि उनकी साहित्यिक कृति ‘हाटे बाजारे’ के नाम पर रेलवे सेवा का नामकरण किए जाने का उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट है कि राष्ट्रीय स्तर पर समय-समय पर बनफूल की स्मृति और साहित्य को सम्मान देने की पहल हुई।
जन्मभूमि में स्मृति संरक्षण अब भी सवाल –
राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलने के बावजूद मनिहारी में बनफूल की जन्मभूमि और उनकी साहित्यिक विरासत को स्थायी स्मारक, संग्रहालय अथवा साहित्यिक शोध-केंद्र के रूप में विकसित किए जाने की मांग लंबे समय से उठती रही है। स्थानीय स्तर पर उनके जन्मस्थान को विकसित करने, स्मारक बनाने तथा उनकी साहित्यिक धरोहर को पर्यटन और अध्ययन से जोड़ने की मांग का उल्लेख मिलता है। वर्षों से स्थानीय लोगों और साहित्यप्रेमियों की अपेक्षा रही है कि बनफूल से जुड़े स्थलों को चिह्नित कर वहां उनकी प्रतिमा, जीवन-दर्शन और प्रमुख कृतियों पर आधारित स्थायी प्रदर्शनी, पुस्तकालय तथा शोध-केंद्र स्थापित किया जाए। इससे आने वाली पीढ़ियों को यह जानने का अवसर मिलेगा कि मनिहारी की धरती ने भारतीय साहित्य को कितना बड़ा रचनाकार दिया था। हाल के वर्षों में उनकी स्मृति को लेकर आयोजन और संरक्षण के अभाव की खबरें भी सामने आई हैं। यह तथ्य सामने आया कि उनकी जयंती पर भी अपेक्षित आयोजन नहीं हो सका और उनकी स्मृतियों को सहेजने की जरूरत महसूस की जा रही है। बनफूल का जीवन और साहित्य आज मनिहारी के लिए केवल गौरव की कहानी नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है। गंगा तट की इस धरती को यदि साहित्यिक पर्यटन के मानचित्र पर पहचान दिलानी है तो बनफूल की जन्मभूमि को उनकी रचनात्मक विरासत से जोड़ना होगा। पद्मभूषण साहित्यकार की जन्मस्थली पर उनकी स्मृति का स्थायी संरक्षण केवल किसी एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि मनिहारी, कटिहार और बिहार की सांस्कृतिक पहचान को सम्मान देने का भी अवसर होगा। सवाल यही है—देश ने जिसे पद्मभूषण दिया, डाक टिकट पर जिसे स्थान दिया और जिसकी रचनाओं ने राष्ट्रीय सिनेमा को प्रभावित किया, उसकी जन्मभूमि कब उसकी स्मृतियों को वह स्थान देगी, जिसकी वह हकदार है?