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गौरवशाली अतीत से विकास की नई पहचान तक पहुंचा कटिहार

दो अक्टूबर 1973 को पूर्णिया से अलग होकर अस्तित्व में आया जिला

जिला स्थापना दिवस पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन


53 वर्षों में प्रशासनिक, कृषि, व्यापार और पर्यटन के क्षेत्र में बढ़ाए कदम

कटिहार -ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक विविधता, कृषि संपदा और गंगा-कोसी-महानंदा जैसी नदियों से समृद्ध कटिहार आज अपनी स्थापना के 53 वर्ष पूरे कर रहा है। दो अक्टूबर 1973 को तत्कालीन पूर्णिया जिले के कटिहार अनुमंडल को अलग कर स्वतंत्र जिला बनाया गया था। तब से अब तक कटिहार ने पांच दशक से अधिक की विकास यात्रा में अनेक उतार-चढ़ाव देखे और धीरे-धीरे उत्तर-पूर्वी बिहार के महत्वपूर्ण जिलों में अपनी पहचान बनाई।

कटिहार का इतिहास जिला बनने से कहीं अधिक पुराना और समृद्ध है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र अंग और मगध के प्रभाव क्षेत्र से जुड़ा रहा। बाद में गुप्त, पाल और सेन शासकों के दौर से गुजरते हुए यह क्षेत्र मध्यकाल में मुस्लिम शासन और फिर मुगल सत्ता के अधीन आया। 18वीं शताब्दी में अंग्रेजी शासन का प्रभाव स्थापित हुआ।

ब्रिटिश काल में राजस्व एवं प्रशासनिक व्यवस्था के विस्तार के साथ क्षेत्र का महत्व बढ़ता गया। बंगाल के विभाजन के बाद यह क्षेत्र बिहार का हिस्सा बना। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी कटिहार के लोगों की सक्रिय भागीदारी का उल्लेख जिला प्रशासन के इतिहास में मिलता है। कटिहार के नामकरण को लेकर भी ऐतिहासिक मान्यता जुड़ी है।

जिला प्रशासन के अनुसार इसका नाम संभवतः शहर के उत्तर-पूर्व स्थित दिधी-कटिहार नामक स्थान से जुड़ा है, जहां नवाब पूर्णिया और मुर्शिदाबाद की सेनाओं के संघर्ष के दौरान सैनिकों के लिए एक बड़ा दिग्घी तालाब बनाया गया था। वहीं मनिहारी से भगवान श्रीकृष्ण के जुड़ाव की धार्मिक मान्यता भी जिले की सांस्कृतिक पहचान को विशिष्ट बनाती है।

53 वर्षों में बदली प्रशासनिक तस्वीर


जिला बनने के समय कटिहार की प्रशासनिक संरचना सीमित थी। जिला तीन अनुमंडलों कटिहार, बारसोई और मनिहारी—तथा 16 प्रखंडों में विस्तृत है। 3,056 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले जिले में 1,547 गांव और तीन शहरी निकाय हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार जिले की आबादी 30,71,029 थी।


विकास के लिहाज से कृषि आज भी कटिहार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। धान, मक्का, गेहूं, केला, जूट, मखाना और दलहन के साथ सब्जियों का उत्पादन जिले की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है। कभी कटिहार की पहचान जूट उद्योग से भी गहराई से जुड़ी थी। जिला प्रशासन के अनुसार यहां की पुरानी और नई जूट मिलों ने शहर की आर्थिक पहचान गढ़ी, हालांकि दोनों मिलें लंबे समय से बंद हैं। वर्तमान में चावल, कृषि आधारित उद्योग, मखाना प्रसंस्करण और व्यापारिक गतिविधियां अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं।

व्यापार और आवागमन का प्रमुख केंद्र


रेलवे के विकास ने कटिहार को व्यापार और आवागमन का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया। कटिहार जंक्शन के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत, बिहार और देश के अन्य हिस्सों से संपर्क मजबूत हुआ। सीमा से सटे होने के कारण नेपाल और पश्चिम बंगाल से व्यापारिक संपर्क ने भी जिले के बाजारों को विस्तार दिया। वस्त्र, कृषि उपज, चावल, मखाना और अन्य कारोबार ने कटिहार को क्षेत्रीय व्यापारिक केंद्र के रूप में स्थापित किया है ।धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत बनी पर्यटन की संभावना


53 वर्षों की यात्रा में कटिहार ने अपनी प्राकृतिक और धार्मिक विरासत को भी नई पहचान दी है। मनिहारी गंगा तट, गोगाबिल झील, बरारी का ऐतिहासिक गुरुद्वारा, गोरखनाथ मंदिर, कष्टहरणनाथ मंदिर और कुर्सेला का गांधी घर जिले की बहुआयामी विरासत को दर्शाते हैं। गोगाबिल झील को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने के प्रयास भी किए गए हैं। बरारी स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा साहिब का संबंध गुरु तेग बहादुर साहिब की 1670 की यात्रा से बताया जाता है।

कटिहार के सामने विकास के साथ बाढ़, कटाव, रोजगार, बंद औद्योगिक इकाइयों के पुनरुद्धार और आधारभूत सुविधाओं के विस्तार जैसी चुनौतियां भी हैं। गंगा, कोसी, महानंदा जैसी नदियों से घिरे जिले के लिए आपदा प्रबंधन और नदी आधारित विकास हमेशा महत्वपूर्ण रहा है।

इतिहास की विरासत और भविष्य की उम्मीदों के बीच कटिहार आज 53 वर्षों की विकास यात्रा के पड़ाव पर खड़ा है। स्वतंत्र जिला बनने से लेकर प्रशासनिक विस्तार, कृषि एवं व्यापारिक प्रगति और पर्यटन की संभावनाओं तक की यह यात्रा कटिहार के बदलते स्वरूप की कहानी कहती है। अब नई पीढ़ी की आकांक्षाओं के अनुरूप उद्योग, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के साथ जिले के विकास को नई दिशा देने की चुनौती है।

रिपोर्ट: सत्येंदु सुमन

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