किसानों को कम्पोस्ट बनाने की वैज्ञानिक विधि अपनाने की जिला कृषि पदाधिकारी ने दी सलाह
कटिहार – खेतों में मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और खेती की लागत कम करने के लिए किसान अब जलकुंभी का उपयोग जैविक खाद बनाने में कर सकते हैं। तालाबों, पोखरों और अन्य जलस्रोतों में तेजी से फैलने वाली जलकुंभी को उपयोगी संसाधन के रूप में अपनाकर कम लागत में पौष्टिक कम्पोस्ट तैयार किया जा सकता है। इस संबंध में जिला कृषि पदाधिकारी राजीव कुमार ने किसानों को जलकुंभी से जैविक खाद बनाने की वैज्ञानिक विधि अपनाने की सलाह दी है।
उन्होंने बताया कि जलकुंभी को पहले जलस्रोतों से एकत्र कर उसकी जड़ों में लगी अतिरिक्त मिट्टी और कीचड़ साफ कर लेना चाहिए। इसके बाद इसे छायादार एवं हवादार स्थान पर फैलाकर अतिरिक्त पानी निकालें और छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें।खाद तैयार करने के लिए ऊंचे एवं जलनिकासी वाले स्थान पर लगभग 1.5 से 2 मीटर लंबा, एक मीटर चौड़ा और 0.75 से एक मीटर गहरा गड्ढा बनाया जा सकता है।
इसमें जलकुंभी की परत के ऊपर सूखी पत्तियां, फसल अवशेष और गोबर की सड़ी खाद डालें। इसी तरह परत-दर-परत सामग्री भरकर पर्याप्त नमी बनाए रखें। समय-समय पर इसे पलटते रहें, ताकि हवा का संचार बना रहे और अपघटन की प्रक्रिया ठीक से हो सके।
सामान्य परिस्थितियों में दो से चार महीने या उससे अधिक समय में कम्पोस्ट तैयार हो सकता है। पूरी तरह सड़ी खाद गहरे भूरे रंग की, भुरभुरी और मिट्टी जैसी गंध वाली होती है। तैयार खाद का उपयोग मिट्टी में मिलाकर फसल की आवश्यकता के अनुसार करना चाहिए।
बेहतर परिणाम के लिए मिट्टी जांच के आधार पर खाद एवं उर्वरकों का संतुलित प्रयोग जरूरी है। जिला कृषि पदाधिकारी श्री कुमार ने किसानों को सावधानी बरतने की भी सलाह दी है।औद्योगिक अपशिष्ट, नाले या प्रदूषित जलस्रोतों से एकत्र जलकुंभी का उपयोग खाद बनाने में नहीं करना चाहिए।
साथ ही खाद तैयार करते समय निकलने वाले दूषित पानी को जलस्रोतों में जाने से रोकना चाहिए। इस पहल से जलकुंभी के प्रबंधन के साथ फसल अवशेषों और गोबर का सदुपयोग होगा तथा प्राकृतिक एवं टिकाऊ खेती को बढ़ावा मिल सकेगा। आत्मा के परियोजना उप निदेशक शशिकांत झा जानकारी दी कि आत्मा द्वारा किसानों को कम लागत मे अधिक पैदावार की जानकारी व खेती किसानी को अधिक लाभप्रद बनाने की दिशा में हर नवीनतम वैज्ञानिक खोजों, तकनीकों से किसानों को अवगत कराया जाता है।