86.63 हेक्टेयर में फैली बिहार की सबसे छोटी रामसर आर्द्रभूमि
सर्दियों में विदेशी मेहमानों से गुलजार होता है झील का परिसर
डाॅ. मिथिलेश कुमार झा /कटिहार – जिले की प्राकृतिक धरोहर गोगाबिल झील को रामसर स्थल के रूप में पहचान मिलने के एक वर्ष पूरे होने के अवसर पर इसकी पर्यावरणीय महत्ता, जैव विविधता और संरक्षण की संभावनाएं एक बार फिर चर्चा में हैं। कटिहार जिले में स्थित यह झील प्रवासी पक्षियों के आश्रय स्थल के साथ-साथ जलीय जीवों, जलीय वनस्पतियों और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। लगभग 86.63 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैली यह सामुदायिक आर्द्रभूमि बिहार के छह रामसर स्थलों में सबसे छोटी बताई जाती है।

गोगाबिल झील की खास पहचान यहां सर्दियों में आने वाले प्रवासी पक्षी हैं। ठंड का मौसम शुरू होते ही विभिन्न क्षेत्रों और देशों से बड़ी संख्या में पक्षी यहां पहुंचते हैं। झील में उपलब्ध जलीय वनस्पति, भोजन, अनुकूल आवास और प्रजनन के लिए उपयुक्त परिस्थितियां इन्हें आकर्षित करती हैं। विशेष रूप से वालागु अट्टू सहित प्रवासी पक्षियों की मौजूदगी इस आर्द्रभूमि के पारिस्थितिक महत्व को रेखांकित करती है।
गर्मी का मौसम शुरू होने पर ये पक्षी अपने मूल आवास की ओर लौट जाते हैं। रामसर स्थल का दर्जा किसी आर्द्रभूमि के अंतरराष्ट्रीय महत्व, जैव विविधता और संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करता है। गोगाबिल झील के लिए भी यह पहचान स्थानीय स्तर पर प्रकृति संरक्षण,पर्यावरणीय जागरूकता और पक्षी पर्यटन की संभावनाओं को मजबूत कर सकती है।

हालांकि, इस पहचान का वास्तविक लाभ तभी मिल सकेगा, जब झील के प्राकृतिक स्वरूप, जलस्रोतों,जलीय वनस्पतियों और पक्षियों के सुरक्षित आवास को बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयास किए जाएं। इस उपलब्धि के साथ झील की सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। जलग्रहण क्षेत्र में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, जल की गुणवत्ता में गिरावट तथा मानवीय गतिविधियां आर्द्रभूमि के लिए चुनौती बन सकती हैं।
ऐसे में स्थानीय समुदाय, प्रशासन और पर्यावरण प्रेमियों की सहभागिता से संरक्षण संबंधी प्रयासों को आगे बढ़ाना जरूरी है। रामसर स्थल के रूप में नामांकन 13 मई 2025 को हुआ था।जबकि इसकी सार्वजनिक घोषणा 30 अक्टूबर 2025 को की गई थी। इस घोषणा के साथ गोगाबिल झील भारत का 94वां रामसर स्थल बनी। अब एक वर्ष बाद यह अवसर केवल उपलब्धि को याद करने का नहीं, बल्कि इस प्राकृतिक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने के संकल्प को मजबूत करने का भी है।