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पिंडदान, पितरों की तृप्ति व मोक्ष की कामना को ले तर्पण हेतु मनिहारी गंगातट पर भी उमडने लगी है भीड़

गयाजी में पितृपक्ष का पिंडदान, पितरों की तृप्ति और मोक्ष की कामना का पर्व

फल्गु तट से विष्णुपद तक आस्था का संगम, गयासुर की पौराणिक कथा और भगवान विष्णु के चरणचिह्न से जुड़ी है प्राचीन परंपरा

मनिहारी /कटिहार -पितृपक्ष में गयाजी में होने वाला पिंडदान सनातन धार्मिक परंपरा में विशेष महत्व रखता है। इसे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आध्यात्मिक स्मरण का माध्यम माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि गया में विधि-विधान से पिंडदान और तर्पण करने से पितरों की तृप्ति होती है तथा उन्हें सद्गति और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। इसी आस्था के कारण पितृपक्ष में देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध कर्म करने गयाजी पहुंचते हैं।

गयाजी की महत्ता का उल्लेख विभिन्न पुराणों और धार्मिक परंपराओं में मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार गयासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या कर ऐसा वर प्राप्त किया था कि उसके दर्शन मात्र से जीवों को पुण्य की प्राप्ति होने लगी। देवताओं के आग्रह पर भगवान विष्णु ने गयासुर को धर्मकार्य के लिए अपना शरीर अर्पित करने को कहा। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने गयासुर के शरीर पर अपना चरण स्थापित किया। यही चरणचिह्न आज विष्णुपद मंदिर में श्रद्धा और उपासना का प्रमुख केंद्र माना जाता है।


गया में पिंडदान की परंपरा को त्रेता युग की कथा से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम ने माता सीता और लक्ष्मण के साथ गया पहुंचकर अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध और पिंडदान किया था। इसी प्रसंग के कारण गया को पितरों के श्राद्ध और तर्पण के लिए विशेष पुण्यभूमि माना जाता है। फल्गु नदी के तट पर पिंडदान और तर्पण की परंपरा भी इसी प्राचीन धार्मिक विश्वास से जुड़ी है।

गयाजी में फल्गु नदी,विष्णुपद मंदिर और अक्षयवट सहित अनेक धार्मिक स्थलों का अपना आध्यात्मिक महत्व है। श्रद्धालु विभिन्न वेदियों पर पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध और दान का अनुष्ठान करते हैं। धार्मिक विश्वास के अनुसार इन कर्मों के माध्यम से श्रद्धालु पितरों के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं और उनके लिए शांति एवं मोक्ष की कामना करते हैं।आध्यात्मिक दृष्टि से पितृपक्ष मनुष्य को अपनी जड़ों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का बोध कराता है। यह परंपरा जीवन की नश्वरता,कर्म, दायित्व और पारिवारिक निरंतरता की भावना से भी जुड़ी है।

पितरों का स्मरण करते हुए श्रद्धालु संयम, दान और सेवा को महत्व देते हैं। इस प्रकार पितृपक्ष में गयाजी का पिंडदान धार्मिक आस्था, पौराणिक विश्वास और आध्यात्मिक चेतना का संगम बनकर सदियों से श्रद्धालुओं को आकर्षित करता आ रहा है। यहां वेदियां श्रद्धालुओं के लिए आस्था और आत्मिक शांति का केंद्र हैं।

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