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किशनगंज:सरकारी विद्यालयों में दीपावली और छठ की छटा, बच्चों ने प्रस्तुतियों से दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश

कहीं रंगोली के माध्यम से ग्रीन दिवाली मनाने का संदेश, तो कहीं छठ महापर्व की झांकी से लोक आस्था और संस्कृति की झलक।

दिघलबैंक/प्रतिनिधि


दीपावली और छठ पूजा की छुट्टियों से पूर्व शुक्रवार को प्रखंड क्षेत्र के विभिन्न सरकारी विद्यालयों में उत्सवी माहौल देखने को मिला। इस अवसर पर स्कूली बच्चों ने अपनी अलग-अलग प्रस्तुतियों के माध्यम से कहीं पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण का संदेश दिया, तो कहीं बिहार के लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा की मनमोहक झांकी प्रस्तुत कर अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ाव का परिचय दिया।

प्राथमिक विद्यालय उत्तर कुढ़ेली में बच्चों ने शिक्षिका जूली कुमारी एवं शिक्षक सुनील कुमार के मार्गदर्शन में रंगों और फूलों से आकर्षक रंगोलियां बनाईं। रंगोली के माध्यम से बच्चों ने ग्रीन दिवाली मनाने का संदेश दिया। उन्होंने अपनी रचनात्मकता के जरिए बताया कि दीपावली खुशियों और रोशनी का त्योहार है। इसे पटाखों और आतिशबाजी के बजाय दीप जलाकर, घर-आंगन सजाकर तथा प्रकृति को सुरक्षित रखते हुए भी हर्षोल्लास के साथ मनाया जा सकता है। बच्चों की रंग-बिरंगी प्रस्तुतियों ने सभी का ध्यान आकर्षित किया।

वहीं, पी.एम. श्री +2 प्रोजेक्ट कन्या उच्च विद्यालय तुलसिया की छात्राओं ने छठ महापर्व पर आधारित आकर्षक झांकी प्रस्तुत की। इसके माध्यम से छात्राओं ने छठ पूजा की धार्मिक मान्यताओं, पारंपरिक रीति-रिवाजों और लोक आस्था को जीवंत रूप में प्रदर्शित किया। उनकी प्रस्तुति में छठ घाट, सूप, फल-प्रसाद और सूर्य उपासना की परंपरा की झलक देखने को मिली। छात्राओं ने अपनी प्रस्तुति से यह संदेश दिया कि आधुनिक शिक्षा के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को जानना तथा उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी जरूरी है।

इस अवसर पर प्राथमिक विद्यालय उत्तर कुढ़ेली के प्रधान शिक्षक विक्रम मिश्रा ने कहा कि विद्यालयों में इस तरह की गतिविधियां बच्चों की रचनात्मक प्रतिभा को निखारने के साथ उन्हें प्रकृति, पर्यावरण और अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति संवेदनशील बनाती हैं। उन्होंने कहा कि दीपावली प्रकाश और खुशियों का पर्व है, इसलिए हमें इसे पर्यावरण के अनुकूल तरीके से मनाना चाहिए। पटाखों से निकलने वाला धुआं और तेज आवाज न केवल वायु एवं ध्वनि प्रदूषण बढ़ाते हैं, बल्कि बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

उन्होंने आगे कहा कि छठ जैसे लोक आस्था के महापर्व हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं। नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं, लोकगीतों और सामाजिक मूल्यों से परिचित कराना शिक्षा का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। बच्चों में बचपन से ही पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता और सांस्कृतिक जुड़ाव की भावना विकसित होगी, तभी वे जिम्मेदार नागरिक बन सकेंगे।

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