न्यूज लेमनचूस

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अंत ही आरंभ है …

मधुबाला मौर्या अंत और आरम्भएक ही डोर के दो छोर चलते है साथ-साथरहते है एकसाथ आरम्भ सीखता जाता हैअंत सिखला जाता है क्षण भर में, जीव का अंतया निर्जीव -जीव हो जाता आरम्भ है तभी तो अंत हैगर अंत नहीं तो आरम्भ कहाँ? आरम्भ में, मैं – मैं ही हूंअंत में, मैं – तुम हूं … Read more

मेरी सिमरन मेरी बेटी !

मधुबाला मौर्या तेरे बचपन की खिलखिलाती हँसीं देखती हूंनिःशब्द उसमें विचरण करती हूं,तेरी बचकानी हरकतों मेंअपना बचपन देखती हूं । तेरी जिद्द, अहंकार देखती हूं न भुल पाने वाला व्यक्तित्व देखती हूं,हर दूसरे को डांटने का खोजना बहानाखाना छोड़ के रूठ जाना कुण्डी लगा के हर बात मनवा लेना,तेरे बचकानी हरकतों में अपना बचपन देखती … Read more

कविता : देव और दानव बच न सके !

मधुबाला मौर्या तुमको है अभिमान दशाननभगवती हर के लाये होप्राण पखेरू उड़ जायेंगेदर्शन होंगे जब रघुवर के, तुमको है अभिमान दुशाशनकेश खींच के लाये होप्राण पखेरू उड़ जायेंगेदर्शन होंगे जब मुरलीधर के, कहे कवयित्री मधुबालानारी का सम्मान करोदेव और दानव बच न सकेयहाँ विष्णु भी पाषाण हु ll Post Visitor Views: 2

प्रगति पथ पर चलता चल

मधुबाला मौर्या प्रगति पथ पर चलता चलनिश्छल भाव से बहता चलरुक कर थोड़ा साहस भर लेकिन्तु, प्रगति पथ पर चलता चल, स्मरण -विस्मरण करता चलअपने वजूद को इंगित करप्रलय नहीं प्रहलाद बन तुप्रगति पथ पर चलता चल, कुछ न कुछ तो सिमटेगाकुछ न कुछ तो मिटेगाअस्तित्व निखर कर आएगाप्रगति पथ पर चलता चल, अभ्यास नहीं … Read more

“आएंगी लौट फिर से खुशियां अपने देश पर”

समोद शर्मा “आएंगी लौट फिर से खुशियां अपने देश पर”ना जाने नजर किसकी लगी, खुशियों के देश पर खेल रहे थे खेल सब, अपने ही मेल परचल रही थी जिंदगी, अपने स्वाव परथाम दिए पग बैरी ने, आकर के ताव पर।                 ना जाने नजर किसकी………थीं इक तरफ … Read more

कान्हा मैं तेरी दीवानी /निधि चौधरी

कान्हा मैं तेरी दीवानी“”””””’’’”””””””””””””””मैं मीरा नहीं हूँ नहीं राधे रानी।सुनो मेरे कान्हा मैं तेरी दिवानी, कि मुरली के धुन पे मैं वारी जाऊँ,मैं तुझ पे ओ मोहन बलिहारी जाऊँ।तू चंदन सा पावन मैं पानी पानी,सुनो मेरे कान्हा मैं तेरी दिवानी। वो वृंदावन की सुनहरी गालियां,वो बागों में खिलती महकती कलियां।तेरे प्रीत की हूँ मैं बहती … Read more

डाकिया

माया गोविंद डाकिये ने द्वार खटखटायाअनबाँचा पत्र लौट आया |साँझ थी और हाथ में था सांझ का दियाडाकिये ने द्वार तभी खटखटा दियामेरा अहि लिखा पत्र हाथ में दियाडाकिया तो चल दिया बुझा दिया दिया |ये दिया बुझा तो बुझा आस का दियाअब तो कोई ज़िन्दगी का दिल बुझा दियाइंतज़ार भी थका, थका मेरा जियाफिर … Read more

मैं अश्कों में बहतें तराने लिखूंगी -निधि चौधरी

मैं अश्कों में बहतें तराने लिखूंगी,बुरे दौर के कुछ फ़साने लिखूंगी। कि दुनिया हमारी है जालिम बहुत ही,वो मासूम दिखते सयाने लिखूंगी। सदाकत, रफ़ाक़त, मुहब्बत हमारी,ये सारे कुचलते ज़माने लिखूंगी। सिकंदर हज़ारों ज़माने में लेकिन,मैं हारे हुए दास्ताने लिखूंगी। इबादत है बिकती हां भक्ति भी बिकती,मैं सच बोलते वो मय’खाने लिखूंगी। ज़मीं से उठा के … Read more

संवेदनहीनता

निधि चौधरी “”””””””’””””””””””नूर लिखूं, बेनूर लिखूं,जीस्त नशे में चूर लिखूं।नाते जल गए अग्नि कुंड में,किसका यह कुसूर लिखूं।बिच्छू पाले डंक सम्हाले,कैसे उनको मस्तूर लिखूं।ज़र्रे ज़र्रे दर्द ही पाया हमने,क्या दर्द को अपने तूर लिखूं।कलयुग का यह रूप भयावह,कलयुग के कैसे दस्तूर लिखूं। Post Visitor Views: 4

परवीन शाकिर की तीन बेहतरीन रचनाएं

(१) उलझन रात भी तन्हाई की पहली दहलीज़ पे हैऔर मेरी जानिब अपने हाथ बढ़ाती हैसोच रही हूंउनको थामूंज़ीना-ज़ीना सन्नाटों के तहख़ानों में उतरूंया अपने कमरे में ठहरूंचांद मेरी खिड़की पर दस्तक देता है (२)बारिश बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की!उसे बुला जिसकी चाहत मेंतेरा तन-मन भीगा हैप्यार की बारिश से बढ़कर क्या बारिश होगी!और … Read more