अंत ही आरंभ है …
मधुबाला मौर्या अंत और आरम्भएक ही डोर के दो छोर चलते है साथ-साथरहते है एकसाथ आरम्भ सीखता जाता हैअंत सिखला जाता है क्षण भर में, जीव का अंतया निर्जीव -जीव हो जाता आरम्भ है तभी तो अंत हैगर अंत नहीं तो आरम्भ कहाँ? आरम्भ में, मैं – मैं ही हूंअंत में, मैं – तुम हूं … Read more