अंधेरे की ऋचा -अमृता भारती
वह एक समय था।मैं पहाड़ों से चाँदनी की तरह उतरा करती थीऔर मैंदानों में नदी की तरह फैल जाती थीमेरे अन्दर हिम-संस्कृति की गरिमा थी और हरे दृश्यों की पवित्रता । मैं प्रेम करना चाहती थी और रास्ते के उस किसी भी पेड़, टेकरी या पहाड़ को गिरा देना चाहती थीजो मेरी रुकावट बनता था … Read more