अनुसूचित जाति उप योजना के अंतर्गत एक दिवसीय जागरूकता कार्यक्रम आयोजित

SHARE:

किशनगंज/पोठिया/राज कुमार

मत्स्यिकी महाविद्यालय अर्राबाड़ी, किशनगंज पशु विज्ञान विश्वविद्यालय पटना के तहत गुरुवार को अनुसूचित जाति उप योजना के अंतर्गत एक दिवसीय जागरूकता कार्यक्रम बेलवा के काशीपुर में हुआ। यह कार्यक्रम अधिष्ठाता डॉ वी.पी. सैनी के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया।

इसमें 215 से अधिक अनुसूचित जाति के युवा, किसान और महिलाओं ने भाग लिया।


वैज्ञानिकों ने मछली प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और इससे मिलने वाले आर्थिक लाभ पर विस्तृत जानकारी दी। टीम ने बताया कि मछली प्रसंस्करण से तैयार होने वाले उत्पादों में मछली का अचार, मछली का अंडा, मछली कटलेट, फिश नगेट्स, फिश पापड़, फिश फ्राई मिक्स, फिश करी मिक्स और कई अन्य आइटम शामिल हैं। इन उत्पादों की बाजार में लगातार बढ़ती मांग किसानों को स्थायी और बेहतर आय देती है।


महाविद्यालय टीम ने बताया कि मछली प्रसंस्करण के लिए तीन दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण अर्राबाड़ी स्थित महाविद्यालय में दिया जाएगा। यह प्रशिक्षण निशुल्क होगा और प्रशिक्षण के बाद प्रतिभागियों को किट भी दी जाएगी।


डॉ पूजा सकलानी ने कहा कि प्रसंस्करण में स्वच्छता, सही तापमान और पैकेजिंग पूरी प्रक्रिया की नींव है। उन्होंने कहा कि इन तरीकों से उत्पाद खराब नहीं होते और बाजार में अधिक मूल्य मिलता है। उन्होंने आगे कहा कि इस काम से ग्रामीण परिवार अपनी आय को कई गुना बढ़ा सकते हैं क्योंकि उत्पाद तैयार कर सीधे बाजार में बेचा जा सकता है।


डॉ परमानन्द प्रभाकर ने कहा कि यह क्षेत्र ग्रामीण महिलाओं, युवाओं और किसानों के लिए आसान और भरोसेमंद आजीविका का माध्यम है। उन्होंने कहा कि छोटे स्तर पर भी प्रसंस्करण यूनिट शुरू की जा सकती है। सरकारी योजनाओं के तहत मशीनें और तकनीक उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि एक बार प्रशिक्षण लेने के बाद लोग कम लागत में इस धंधे को शुरू कर स्थिर आय प्राप्त कर सकते हैं।


डॉ मोहम्मद अमन हसन ने कहा कि प्रसंस्कृत मछली की बाजार में मांग लगातार बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि मछली जल्दी खराब होती है लेकिन प्रसंस्करण के बाद इसकी शेल्फ लाइफ बढ़ जाती है। इससे नुकसान रुकता है और किसानों को सीधा फायदा मिलता है। उन्होंने कहा कि सुरक्षित पैकेजिंग और कोल्ड चेन अपनाने से उत्पाद लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं और इससे आय भी बढ़ती है।


डॉ अभिषेक ठाकुर ने कहा कि ग्रामीणों को इस तकनीक को सीखकर घर से ही छोटे स्तर पर काम शुरू करना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रसंस्करण की किट मिलने से शुरुआत आसान होती है और लोग अपने उत्पाद को स्थानीय और बाहरी बाजार दोनों में बेच सकते हैं।


डॉ सरवेंद्र कुमार ने कहा कि प्रसंस्करण, खेती करने वाले परिवारों के लिए नई आय का अवसर है। उन्होंने कहा कि यह धंधा समय और लागत दोनों के हिसाब से लाभदायक है और इससे किसानों को अतिरिक्त आय मिलती है जो खेती के मौसम से अलग होकर साल भर कमाई देती है।
वैज्ञानिकों ने प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों के सवालों के जवाब दिए और सभी को आगामी प्रशिक्षण में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम में सैकड़ों ग्रामीण उपस्थित रहे।

सबसे ज्यादा पड़ गई