मनिहारी /कटिहार – गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर बुधवार को मनिहारी गंगातट पर जिले सहित आसपास के कई क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए पहुंचे। श्रद्धालुओं ने गंगा में आस्था की डुबकी लगाकर गुरुजनों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की तथा सुख-समृद्धि की कामना की। सुबह से ही घाटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी और पूजा-अर्चना का सिलसिला देर तक चलता रहा।
हालांकि श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के बावजूद गंगातट पर प्रशासनिक तैयारियां नाकाफी नजर आईं। घाट तक पहुंचने वाले मार्गों पर अव्यवस्था, पसरी गंदगी, रेनकट के कारण बने गढ्ढे के कारण लोगों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को विशेष परेशानी हुई।
भीड़ नियंत्रण, अस्थायी वस्त्र परिवर्तन घर तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं का भी समुचित प्रबंध नहीं दिखा।
श्रद्धालुओं ने बताया कि मनिहारी गंगातट का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व होने के कारण प्रत्येक पर्व और मांगलिक अवसर पर हजारों लोग यहां स्नान के लिए पहुंचते हैं। इसके बावजूद सुविधाओं के अभाव से परेशानी उठानी पड़ती है। लोगों ने प्रशासन से प्रमुख धार्मिक अवसरों पर बेहतर व्यवस्था, सुरक्षित स्नान, साफ-सफाई तथा आवागमन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की। ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
गुरु पूर्णिमा का धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व –
आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि पर मनाया जाने वाला गुरु पूर्णिमा पर्व भारतीय संस्कृति में गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। जिन्होंने वेदों का संकलन तथा महाभारत सहित अनेक ग्रंथों की रचना की। इसलिए इस पर्व को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धालु अपने गुरुजनों का पूजन कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं तथा ज्ञान,सद्बुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की कामना करते हैं। इस दिन गंगा सहित पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य, पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है। मनिहारी गंगातट पर भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे और गंगा स्नान कर पूजा-अर्चना की। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किए गए स्नान, दान और गुरु वंदना से जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। गुरु पूर्णिमा भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा को सशक्त बनाने वाला प्रमुख पर्व माना जाता है।


























