किशनगंज/प्रतिनिधि
जहां आज पर्यावरण संरक्षण केवल नारों तक सिमटता जा रहा है, वहीं मोतीबाग वार्ड संख्या–7 की निवासी श्रीमती अंजू झा अपने जीवन से यह साबित कर रही हैं कि पौधारोपण केवल हरियाली नहीं, बल्कि सृष्टि की रक्षा का संकल्प है। अखिल विश्व गायत्री परिवार से वर्ष 1980 से जुड़ी श्रीमती झा दशकों से नारी जागरण और पर्यावरण चेतना की अलख जगा रही हैं।

राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित पर्यावरणविद व शिक्षाविद, सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक श्री श्यामानंद झा की धर्मपत्नी श्रीमती अंजू झा ने अपने चार वर्षीय पोते चिरंजीव अगस्त्य के जन्मदिवस पर पौधारोपण कर समाज को सशक्त संदेश दिया। उन्होंने बताया कि पर्यावरण प्रेम की प्रेरणा उन्हें बचपन में ही अपने पिता स्वर्गीय रामानंद मिश्र से मिली, जो कहते थे— “पौधा लगाने से भगवान प्रसन्न होते हैं।” इसी आस्था ने उन्हें आठ–नौ वर्ष की उम्र से प्रकृति सेवा से जोड़ दिया।

वर्ष 1974 में पाणिग्रहण संस्कार के बाद उन्हें ऐसा परिवार मिला, जहां सेवा, संस्कार और प्रकृति के प्रति समर्पण जीवन का मूल मंत्र रहा। उन्होंने इसे अपने पुण्य कर्मों का प्रतिफल बताते हुए कहा कि उनके पतिदेव गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं गायत्री माता के विचारों से जुड़कर राष्ट्रसेवा में जीवन अर्पित कर चुके हैं।
स्वयं को सामान्य गृहिणी बताते हुए श्रीमती झा कहती हैं कि वे भले ही अधिक शिक्षित न हों, लेकिन संस्कारों की शिक्षा उन्हें मायके और ससुराल दोनों से भरपूर मिली। उन्होंने गृहस्थ जीवन की संपूर्ण जिम्मेदारी निभाकर अपने पति को राष्ट्रसेवा के लिए मुक्त रखा, जिससे उनके कार्य आज इतिहास बन सके—जो प्रदेश ही नहीं, पूरे राष्ट्र के लिए गौरव हैं।

आज भी वे सामाजिक, धार्मिक और प्रेरक कार्यक्रमों में सक्रिय हैं और नारी समाज को शिक्षा, संस्कार एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करती रहती हैं। पर्व-त्योहारों, जन्मदिवसों और धार्मिक आयोजनों पर माता, पिता, गुरु और पूर्वजों के नाम पौधारोपण की परंपरा उन्होंने जन-आंदोलन में बदल दी है।उनके आवास की हरित बगिया—तुलसी, आंवला, आम, लीची, केला, अमरूद, पीपल, बरगद, नीम, बेल, कटहल और फूलों से सजी—आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित विरासत का सशक्त संदेश देती है।
जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें कभी रोक-टोक का सामना करना पड़ा, तो उन्होंने दृढ़ता से कहा—“मेरे पतिदेव में नारी सम्मान का भाव है। यदि हर पुरुष यह भाव अपना ले, तो धरती स्वर्ग से भी सुंदर बन सकती है।”श्रीमती अंजू झा की यह जीवन-यात्रा बताती है कि नारी जब संस्कार, सेवा और पर्यावरण को साधना बना ले, तो समाज का भविष्य स्वयं सुरक्षित हो जाता है।





























