देश / संपादकीय/सुशील
16 मजदूर थके हारे, पैदल चलते हुए घर लौट रहे थे, रात मे थक कर रेल की पटरी पर ही सो गए और बाकी खबर आप जानते ही है, घटना 8 मई की थी।
पुनः 14 मई की रात मध्यप्रदेश में एक सड़क हादसे में 9 मजदूर मारे गए जहाँ 51 अन्य घायल हुए।
ऐसे ही एक के बाद अन्य दुर्घटना की खबरें आती ही जा रही है।
हम अभी इन हादसों से उबर भी नही पाए थे कि कल उत्तर प्रदेश के औरैया में एक और भीषण सड़क हादसा हुआ जिसमे ट्रक में सवार 24 मजदूर मारे गए।
ये सारे श्रमिक राजस्थान से बिहार, झारखंड और बंगाल अपने घर जा रहे थे।
कोरोना की त्रासदी के बीच पैदल घर लौटते मजदूर , और हादसों का शिकार बनते मजदूरों की कहानी काफी कुछ बताती है।
गर्मी का मौसम, 40 डिग्री के लगभग तापमान, उमस और कंधे पर लटके भारी भरकम झोले में जरूरी सामान के साथ रोते बच्चे बिलखते परिजन ,निराशा , अनिश्चितता और भूखे पेट घर पहुँचने की आस लिए लंबे रास्तों के अनजाने सफर पर निकले वे बस मजदूर भर नही है। वे मजबूर भी है…
तमाम सरकारे जिनके पास तमाम ताकते और निर्णय करने के उपकरण है, संसाधन है , जब वह स्वयं लाचार हो जाये तो इन श्रमिको को मजबूर कहना इनकी श्रम शक्ति का उपहास होगा ।
हौसले इनके सिर्फ मजदूरी करने भर के लिए बुलन्द नही है, यह वो शक्ति है जब संसाधन उपलब्धि पर सरकार फैल हो जाती है तो ये हजारों किलोमीटर का सफर पैदल और साईकल पर ही नाप देते हैं।
परंतु प्रश्न तो बनता है
और यही बनता है कि आज क्यों ये इतने हौसले के साथ घर ही लौटना चाहते हैं ?
आखिर क्यों दिल्ली बम्बई जैसे महानगरों और देश के जीडीपी में बढ़ चढ़ कर योगदान देने वाले बड़े राज्य इनकी सुरक्षा सुनिश्चित नही कर सकी ?
सरकार जहाँ मजदूरों के घर वापसी के लिए बसें, ट्रेनें चला रहे हैं, वहाँ पैदल सफर क्यों ?
आपको बता दूं कि इन अप्रवासी श्रमिको कामगारों के 90% लोग जो बड़ी फैक्टरियों में मजदूरी करते है, इनकी नौकरियों की कोई सुरक्षा नही होती , ये आते तो है अपने गाँव से किसी लेबर ठेकेदारों के भरोसे जहाँ इनके मजदूरी तय करने को कोई मापदंड ही नही होते।
इन्हें रोज काम करना पड़ता है क्योंकि ठेकेदार इन्हें काम करने के ही पैसे देगा, एक दिन बैठने का अर्थ उस दिन की मजदूरी से हाथ धोना।
सोच कर देखिए जहाँ इतनी असुरक्षा हो वहाँ ये मजदूर दो वक्त की रोटी के लिए किसके सहारे रहेंगें, ऐसे में घर वापसी ही एकमात्र विकल्प बचता है।
कहने को तो सरकारे काम कर रही है, परंतु इतनी बड़ी संख्या में घर लौटते कामगारों और श्रमिकों की स्थिति भी बहुत कुछ सवाल करते हैं, यह बताती है कि कहीं न कहीं सरकार और सरकारी तंत्र की असफलता के चलते इन्हें कोई लाभ नही मिल सका।
सवाल कई है जिनके उत्तर में कई तर्क दिए जा सकते हैं, परंतु वास्तविकता यही है कि एक सामाजिक ढाँचे के तौर पर शायद हम अब भी बहुत कमजोर है ।

























