ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध: हमलों ने कितना बदला समीकरण, किसे कितना नुकसान?

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डेस्क:मध्य-पूर्व में जारी ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध अब केवल सैन्य टकराव नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन, वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीतिक भविष्य की बड़ी लड़ाई बन चुका है। पिछले कुछ हफ्तों में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के परमाणु, मिसाइल और सैन्य ढांचे पर लगातार हमले तेज किए हैं, वहीं ईरान ने भी मिसाइल और ड्रोन हमलों के जरिए इजरायल और अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाकर साफ संकेत दिया है कि वह केवल रक्षात्मक भूमिका में नहीं है। इस युद्ध का असर अब संपूर्ण विश्व पर पड़ने लगा है ।

अमेरिकी हमलों का ईरान पर अब तक क्या असर पड़ा?

अब तक की रिपोर्टों से साफ है कि अमेरिका और इजरायल के संयुक्त या समानांतर हमलों का सबसे बड़ा असर ईरान के न्यूक्लियर और सैन्य इंफ्रास्ट्रक्चर पर पड़ा है। ईरान के नतांज परमाणु केंद्र पर बार-बार हमले हुए, जिनसे भूमिगत संवर्धन ढांचे के प्रवेश और संबंधित सुविधाओं को नुकसान पहुंचा। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने भी पहले हुए हमलों से संवर्धन संबंधी ढांचे को नुकसान की पुष्टि की है, हालांकि अब तक किसी बड़े रेडिएशन रिसाव की पुष्टि नहीं हुई है। 

अमेरिका और इजरायल का दावा या आकलन यह है कि इन हमलों से ईरान की मिसाइल क्षमता, नौसैनिक क्षमता और सैन्य कमांड संरचना कमजोर हुई है। दूसरी ओर, अमेरिकी खुफिया आकलन यह भी कहता है कि भारी बमबारी के बावजूद ईरानी शासन टूटा नहीं है; उलटे सत्ता का नियंत्रण और अधिक कठोर तत्वों, खासकर आईआरजीसी, के हाथ में सिमटता दिख रहा है। यानी सैन्य ढांचे को चोट पहुँची है, लेकिन राजनीतिक व्यवस्था ध्वस्त नहीं हुई।

युद्ध का असर केवल सैन्य प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं रहा। ईरान में बड़े पैमाने पर जन-धन की हानि, भवनों का विनाश, तेल ढांचे पर दबाव और नागरिक क्षति की खबरें भी सामने आई हैं। कुछ रिपोर्टों में ईरान समेत युद्ध-क्षेत्र में कुल मौतों का आंकड़ा 2,300 से ऊपर बताया गया है, जबकि अलग-अलग स्रोतों में केवल ईरान में 1,300 से 1,400 से अधिक नागरिक मौतों का उल्लेख भी मिलता है। अलग-अलग स्रोतों में आंकड़े भिन्न हैं, इसलिए इन्हें अंतिम नहीं माना जा सकता, लेकिन यह स्पष्ट है कि अमेरिकी-इजरायली हमलों ने ईरान के भीतर भारी अस्थिरता और मानवीय संकट पैदा किया है। 

क्या अमेरिका अपने लक्ष्य में सफल हुआ?

आंशिक रूप से हाँ, लेकिन पूरी तरह नहीं। अमेरिका और इजरायल ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल नेटवर्क और क्षेत्रीय हमलावर क्षमता को कमजोर करना चाहते थे। नतांज जैसे केंद्रों पर प्रहार, सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना और ईरानी बुनियादी क्षमताओं को क्षति पहुँचाना इस दिशा में उपलब्धि मानी जा सकती है। लेकिन यदि लक्ष्य ईरान की प्रतिरोध क्षमता समाप्त करना, शासन परिवर्तन कराना या हमले रोक देना था, तो वह लक्ष्य अभी हासिल नहीं हुआ दिखता। अमेरिकी खुफिया आकलन के अनुसार ईरानी शासन अब भी कायम है और प्रतिरोध की क्षमता बची हुई है। 

ईरान के पलटवार कितने घातक सिद्ध हुए?

ईरान के हमलों ने यह साबित कर दिया कि लगातार बमबारी के बावजूद उसकी जवाबी क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई। ईरान ने इजरायल पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिनमें नागरिक इलाकों पर भी असर देखा गया। एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी क्लस्टर मिसाइल रिषोन लेजियॉन में किंडरगार्टन पर गिरी; सौभाग्य से उस समय बच्चे मौजूद नहीं थे, लेकिन इससे हमलों की गंभीरता और नागरिक खतरे का स्तर स्पष्ट हुआ। 

इजरायल में भी मौतों और क्षति की खबरें हैं। 

कुछ स्रोतों के अनुसार युद्ध की शुरुआत से अब तक इजरायल में कम-से-कम 15 लोगों की मौत हुई है। इसके अलावा वेस्ट बैंक में भी एक मिसाइल घटना में चार फ़िलिस्तीनी महिलाओं की मौत की खबर आई, जिसे इजरायली इंटरसेप्शन और ईरानी मिसाइल हमले के संदर्भ में देखा जा रहा है। इससे साफ है कि ईरान के हमले केवल प्रतीकात्मक नहीं रहे, बल्कि उन्होंने वास्तविक जनहानि और मनोवैज्ञानिक दबाव दोनों पैदा किए हैं।

अमेरिका पर ईरान के हमलों का प्रभाव भी नजर आया है। अमेरिकी सैन्य आंकड़ों के अनुसार कम-से-कम 200 अमेरिकी सैनिक घायल हुए, जिनमें जलने, छर्रे लगने और ट्रॉमैटिक ब्रेन इंजरी जैसे मामले शामिल हैं। 13 अमेरिकी सैनिकों की मौत की भी रिपोर्ट है, हालांकि इनमें कुछ मौतें प्रत्यक्ष मिसाइल/ड्रोन हमलों के अलावा संबंधित सैन्य घटनाओं में हुईं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ईरान अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को चोट पहुँचाने में पूरी तरह विफल नहीं रहा।

हालांकि, ईरान के कुछ हाई-प्रोफाइल हमले सीमित असर वाले भी रहे। उदाहरण के लिए डिएगो गार्सिया स्थित यूके-अमेरिका बेस पर दागी गई मिसाइलें लक्ष्य पर निर्णायक चोट नहीं कर सकीं; एक विफल हुई और दूसरी को रोके जाने की बात सामने आई। इसका मतलब यह है कि ईरान के पास लंबी दूरी तक मार करने की क्षमता तो है, लेकिन हर हमला रणनीतिक रूप से निर्णायक साबित नहीं हुआ। 

मालूम हो कि ईरान ने लगभग 4 हजार किलोमीटर की दूरी पर स्थित डिएगो गार्सिया स्थित यूके-अमेरिका बेस पर मिसाइल दागी जिसके बाद ईरान की क्षमता का पता चलता है 

किसका पलड़ा अभी भारी?

मौजूदा स्थिति में सैन्य क्षमता और हवाई व तकनीकी बढ़त अमेरिका-इजरायल गठजोड़ के पक्ष में दिखती है। उन्होंने ईरान के संवेदनशील प्रतिष्ठानों तक पहुंच बनाकर भारी क्षति पहुंचाई है। लेकिन रणनीतिक सहनशक्ति, प्रतिरोध और क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा करने की क्षमता अब भी ईरान के पास मौजूद है। यही कारण है कि भारी हमलों के बावजूद युद्ध थमता नहीं दिख रहा। 

अब तक के घटनाक्रम से तीन बातें साफ हैं। पहली, अमेरिकी और इजरायली हमलों ने ईरान के परमाणु और सैन्य ढांचे को नुकसान पहुंचाया है। दूसरी, इन हमलों से ईरान की राजनीतिक-सैन्य इच्छाशक्ति खत्म नहीं हुई, बल्कि सत्ता और अधिक कठोर हाथों में सिमटती दिख रही है। तीसरी, ईरान के जवाबी हमले पूरी तरह निष्प्रभावी नहीं रहे; उन्होंने इजरायल और अमेरिकी हितों को वास्तविक क्षति, जनहानि और मनोवैज्ञानिक दबाव पहुंचाया है। इस लिहाज से यह युद्ध किसी एक पक्ष की आसान जीत नहीं, बल्कि लंबी और महंगी टकराहट में बदल चुका है। 

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