यहां पारंपरिक फगुआ की गूंज अब भी है कायम

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हसनगंज /कटिहार -राजवाड़ा पंचायत में आज भी होली का त्योहार पारंपरिक अंदाज में मनाया जाता है। बसंत पंचमी के बाद से ही यहां फगुआ की आहट सुनाई देने लगती है। पंचायत क्षेत्र के ब्रह्मचारी गांव में ढोलक,हारमोनियम,झाल और करताल की थाप पर फगुआ गीत गूंजने लगते हैं। गांव के बुजुर्ग चार-पांच की टोली बनाकर गोधूलि बेला से लेकर देर शाम तक फगुआ गाकर माहौल को रंगीन बना देते हैं।

रामानंद खरवार,उमाशंकर पांडेय और भीम खरवार सहित कई ग्रामीणों का कहना है कि बदलते परिवेश में पारंपरिक होली और फगुआ गीतों की जगह अब डीजे और इलेक्ट्रॉनिक वाद्ययंत्रों ने ले ली है। इससे युवाओं का रुझान पारंपरिक गायन से कुछ कम हुआ है।ग्रामीणों ने बताया कि पहले बसंत पंचमी से ही गांवों में फगुआ का उत्साह चरम पर पहुंच जाता था।

लोग टोली बना कर ढोलक-हारमोनियम के साथ घर-घर जाकर फगुआ गाते थे। इसकी गूंज पूरे गांव में सुनाई देती थी। होली के दिन छोटे-बड़े का भेद मिट जाता था। सभी एक-दूसरे के दरवाजे पर जाकर रंग-गुलाल लगाते,फगुआ गाते और नाचते थे।इस परंपरा में जहां उमंग और उल्लास था।

वहीं आपसी प्रेम और सामाजिक सौहार्द की झलक भी दिखती थी। हालांकि बदलते समय के साथ युवाओं का आकर्षण कुछ कम जरूर हुआ है। लेकिन रामानंद खरवार सहित कुछ ग्रामीण आज भी इस परंपरा को जीवित रखने के लिए प्रयासरत हैं। बहरहाल, राजवाड़ा पंचायत में फगुआ की यह परंपरा अब भी सांस्कृतिक विरासत के रूप में लोगों के दिलों में बसी हुई है।

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