मधुबाला मौर्या
सियासी राजनीति और पूर्वाग्रह से ग्रसित लोगों को क्या कहे यदि हर उचित काम में भी उस को राजनीतिक ढांचा दे तो?
मैं एक प्रश्न पूछना चाहती, सबसे की इतने सालो तक गाँवों में, घर -घर कार्य कर रही लाखों आँगनवाड़ी, आशा कर्मचारियों का ख्याल मोदी सरकार को ही क्यों आया, कहाँ थे बाबू साहब लोग जब ये महिलाएं हज़ार दो हज़ार में गाँवों- गाँवों में सुविधा प्रदान कर रही थी ?
कहाँ थे मंत्री गण लोग जिनको दिखाई नहीं दिया जमीनी स्तर पर कार्य करने वाली महिलाओं की ज़रूरतें, आखिर मोदी सरकार ने सुना तो क्यों, आप बाबू लोग कहाँ थे?
आप जनता सिर्फ भेड़ चाल चलती है, जब जो मंत्री ने कह दिया आपने मान लिया लेकिन आयुष्मान जैसी बीमा पॉलिसी लाकर सभी गरीबों को मुफ्त चिकित्सा की शुरूआत कराने वालों को क्या एक बार भी धन्यवाद कहा, की इसमें भी सियासी राजनीती के दावपेंच खोजते है?
एक शिक्षक होने के नाते उन सभी शिक्षकों से पूछना चाहती की सरकार ने शिक्षकों को सातवें वेतन की मंज़ूरी दिलाई, न्यू पेंशन स्कीम में भी सुधार की गुन्जाईस है, क्या हमने राज्य- राज्य घूम कर तब सरकार के इस फैसले का शुक्र अदा किया?
मैं उन सभी बुद्धिजीवियों से पूछना चाहती की देश में 32,000 करोड़ बैंक अकाउंट खुल गया जन धन योजना के अंतर्गत, क्या आपने इसके जागरूकता में आवाज उठाई या बस हर अच्छी चीज में बुरी चीज खोजना ही बुद्धिजीवी का परिचायक है?
आप आम जनता के नाम पर भूख हड़ताल करते है, अच्छी बात पर कभी कहा की बहनों सरकार ने 5 करोड़ मुफ्त एलपीजी कनेक्शन गरीब महिलाओं के लिए किये है उनका उपयोग इस प्रकार से करो की बस कौन एलपीजी से जली उनपर ही नारा लगेगा?
माल्या, नीरव, चौकसी करोड़ो का घोटाला कर भाग गए । लेकिन प्रवर्तन निदेशालय सरकार ने बेनामी प्रॉपर्टी के लिए एक्ट का संशोधन किया ताकि लोग भाग जाये तो उनकी वसूली उनसे ही हो उस कदम की सराहना किया की बस रेलवे ट्रैक पर लोगों को खड़े करके यातायात साधनों की क्षति ही कराई?
नोटबंदी से कितनी जाने गयी इसका आंकड़ा रखते है 600 करोड़ हाल ही में नोट बंदी के दौरान फ्लैट में किलो के दाम मिले तब क्या आप लोगों का आंदोलन चला, नोटबंदी को समझने वालों कभी गहराई से विश्लेषण करो इसकी मार ने कितने काला धन ख़त्म कर दिया थोड़ा चिंतन की ज़रूरत ना की चिंता की क्या आप जागरूक जनता जो हर बात पर सरकारी अफसरों से हर समय हर जगह, हॉस्पिटल, रोड्स, ट्रैन, एयरपोर्ट बन रहे के बारे में जानकार ली की केवल उनसे एक्ट के पास – फ़ैल के आंकड़े है लेंगे, बुद्धिजीवी और जागरूकता दोनों ही इस दौर की चाह है निःसंदेह पर अच्छी चीज़ों पर संदेह और हर काम में अच्छाई से पहले बुराई पहुंच जाये तो समझ ले आप पूर्वाग्रह से ग्रसित है जिन्हें अच्छी चीज़ों में भी बुराई की खोज रहती ।
आज देश दो मुख्य समस्याओं से गुज़र रहा बलात्कार और बेरोजगारी क्या हमने कभी थोड़ा सा भी चिंतन किया की मुजफ्फरपुर से देवरिया के अनाथालय में मासूम बच्चियों को नोंच कर खाने वालों के खिलाफ भूख हड़ताल या नारे लगाए?
सरकार ने आसिफा, गीता जैसी बच्चियों को बचाने के पोस्को कानून बनाये मगर हमने क्या किया? केवल नारों के अलावा, हमने बस सरकारी महकमों, पुलिस, न्यायिक प्रक्रियाओं में ढील, बेईमानी ही तो खोजी है, कभी बच्चियों के गुनहगारों की तलब कहा रही, पुरुष प्रधान देश महिलाओं की समानता की बात करता है, अच्छी सोच के साथ किन्तु हज़ारों सालो से पीड़ित तीन तलाक़ महिलाओं के साथ खड़े आजतक एक भी पटेल या हज़ारे साहब नहीं दिखे, चिंतित हु, व्यथित हु सोच में हु हर बात में बस नकारात्मक सोच ही क्यों है ।
क्यों हम आज भी विष्णु अवतार की प्रतीक्षा में है, क्यों हम अब भी रामराज्य, सत्य, अहिंसा के इंतजार में है, समझ में नहीं आता कैसे आधुनिक बुद्धिजीवी है हम.
लेखिका का परिचय नाम : मधुबाला मौर्या एम.ए ( इंग्लिश,शिक्षाशास्त्र,दर्शनशास्त्र ) असिस्टेंट प्रोफेसर ( शिक्षा विभाग )






























