न्यूज लेमनचूस

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मंत्र हूं – दुष्यंत कुमार

मंत्र हूँ तुम्हारे अधरों में मैं!एक बूँद आँसू में पढ़कर फेंको मुझकोऊसर मैदानों परखेतों खलिहानों परकाली चट्टानों पर….।मंत्र हूँ तुम्हारे अधरों में मैं आज अगर चुप हूँधूल भरी बाँसुरी सरीखा स्वरहीन, मौन;तो मैं नहींतुम ही हो उत्तरदायी इसके।तुमने ही मुझे कभीध्यान से निहारा नहीं,छुआ या पुकारा नहीं,छिद्रों में फूँक नहीं दी तुमने,तुमने ही वर्षों सेअपनी … Read more

कैद परिंदो का ब्यान – दुष्यंत कुमार

तुमको अचरज है–मैं जीवित हूँ!उनको अचरज है–मैं जीवित हूँ!मुझको अचरज है–मैं जीवित हूँ! लेकिन मैं इसीलिए जीवित नहीं हूँ–मुझे मृत्यु से दुराव था,यह जीवन जीने का चाव था,या कुछ मधु-स्मृतियाँ जीवन-मरण के हिंडोले परसंतुलन साधे रहीं,मिथ्या की कच्ची-सूती डोरियाँसाँसों को जीवन से बाँधे रहीं;नहीं–नहीं!ऐसा नहीं!! बल्कि मैं जिंदा हूँक्योंकि मैं पिंजड़े में क़ैद वह परिंदा … Read more

बेटी

सिसकती तड़पती बिलखती है बेटी,यहां हर कदम रोज़ लुटती है बेटी। बयां क्या करूँ मैं दरिदों की खसलत,जन्म लेने से पहले ही मरती है बेटी। वो कान्हा वो मोहन कहाँ खो गए हैं,यहाँ द्रोपदी सी, न बचती है बेटी। ये सच है इसी के ही दम से गुलशन,मग़र कुछ दरिन्दों को खलती है बेटी। ये … Read more