कोरोना : माटी का संसार है खेल सके तो खेल, बाजी रब के हाथ है पूरा विज्ञान फेल,

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अतिथि संपादक /श्री प्रवीण गोविंद

माना कि यदि पेट पहले ही चिंता से भरा हो, तो भूख के लिए उसमें जगह नहीं बचती। लेकिन भूख तो आखिर भूख है। वह लगती ही है, आखिर चिंता के कारण उसे आप कब तक मार सकते, कब तक पानी के सहारे जी सकते। भूख के लिए रोटी-भात चाहिए, चाहिए ही चाहिए। महामारी में भी भूख लगती है, बेरोजगारी में भी भूख लगती है। खुशी हो या गम यह लगती ही है।आदमी हो या जानवर या फिर पंक्षी ही क्यों न हो, पेट सभी को है। इसी पेट के लिए लोगबाग पाप-पुण्य करते हैं, और जब पाप का घड़ा ओवरफ्लो हो जाता है तो…। सभी जानते हैं कि इसका भोग देर-सबेर भोगना ही पड़ता। लेकिन अभी जो कायनात की स्थिति है इस समय पाप-पुण्य के बीच जो सबसे जरूरी है, वह है भात-रोटी। यहां सवाल उठता है कि आनेवाले दिनों में आखिर सभी के कैसे जलेंगे चूल्हे। इसे हल्के में लेना मूर्खता भरी बात होगी। कारण कोरोना का कहर के बीच भूख के कारण लोगों के मरने की घटना से हम इन्कार नहीं कर सकते।

पड़ सकता है बहुत बड़ा अकाल

यूनाइटेड नेशन्स ने यह चेतावनी जारी की है कि कोरोना महामारी की वजह से बहुत बड़ा अकाल पड़ सकता है, जिससे दुनिया की काफी आबादी प्रभावित होगी। कई देशों में अनाज की कमी हो सकती है और खाद्य असुरक्षा बढ़ सकती है। यूएन ने लोगों को भूखों मरने से बचाने के लिए 4.7 बिलियन डॉलर (करीब 3,55,01,45,00,000 रुपए) के फंड की जरूरत बताई है। यूएन के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डेविड बीसले ने जेनेवा में आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में कहा है कि लोगों के हेल्थ से जुड़ी यह महामारी जल्दी भूख की महामारी में बदल सकती है। यूएन ने भारत की हालत भी कोई अच्छी नहीं बताई है। इस संगठन का कहना है कि कोरोना की वजह से भारत में आर्थिक संकट काफी बढ़ सकता है और लोगों को अकाल का सामना करना पड़ सकता है।

महामारी के बीच सरकारी तैयारी पर निर्भर है सबकुछ

प्रसिद्ध कवि धूमिल ने कहा है, भूख से मरा हुआ आदमी इस मौसम का सबसे अच्छा विज्ञापन है। भगवान न करे कि कोई भी विज्ञापन बने। कहते हैं कि जब-जब पृथ्वी पर अनाचार, अत्याचार पराकाष्ठा को पार करता है तब-तब भगवान पृथ्वी पर अवतरित हो उसका अंत कर धर्म की स्थापना करते हैं। श्रीकृष्ण की एक-एक लीला पर ध्यान से विचार कीजिए, चाहे वह कंश वध हो या महाभारत में कौरवों का नाश हर लीला के पीछे श्रीकृष्ण का उद्देश्य पृथ्वी पर धर्म की स्थापना करना था। लेकिन; आज की तारीख में हो क्या रहा है? इसमें कोई दो राय नहीं है कि धरती पर न्याय झुलस रहा है, अन्याय ठहाके मारकर हंस रहा है। यह सब कोरोना-मरो ना
तो होगा ही, अभी भी संभल जाइए, सात्विक आहार, सात्विक विचार पर अमल कीजिए। सभी का जाना तय है, यही सत्य है। यह तो एक बहाना मात्र है कि उसकी कैंसर से मौत हुई, उसकी सड़क दुर्घटना में, तो फलां की कोरोना से आदि-आदि, मौत तो पहले से तय है। लॉकडाउन को हल्का में मत लीजिए। ठीक है कि आप रोज ऊपर वाले को याद करते हो पर कभी आपने सोचा है कि किसी दिन भगवान ने याद कर लिया तो..? सो जभी जागो तभी सवेरा। स्थिति विकट है, जरूरी होने पर ही घर से निकलिए। भयावह सच यही है कि ना कोई तेरा और ना ही मेरा। कहा भी गया है कि ” होइहि सोइ जो राम रचि राखा। ” भावार्थ:-जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। तो फिर टेंशन नहीं लेने का। अपना फर्ज ईमानदारी से निभाएं, लॉकडाउन का पालन करें, सतर्क रहेंगे तो सवाल ही नहीं उठता कि कुछ भी हो। सतर्क नहीं रहेंगे तो फिर माटी का संसार है खेल सके तो खेल, बाजी रब के हाथ है पूरा विज्ञान फेल। जहां विज्ञान ही फेल है तो फिर हम-आप किस खेत की मूली हैं। कुल मिलाकर इतिहास साक्षी है कि संक्रमण बीमारी फैला कर मानव सभ्यता का विनाश करता रहा है। मनुष्य में संस्कार और संक्रमण
दोनों ही एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलते हैं। जीवन की बहुमूल्य विशिष्टता, सम्पदा और चरित्र निर्माण का आधार संस्कार है। सो ध्यान रखिए संस्कार कायम रखने के बीच घर में रहिए, सुरक्षित रहिए। भगवान से यही कामना है कि हर किसी की थाली में रोटी हो। वैसे सबकुछ महामारी के बीच सरकारी तैयारी पर निर्भर है।

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