कोरोना की जंग और सिमटती जिंदगी ।

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वर्ष 2020 की शुरुआत हमने हमेशा की तरह जोश, उमंग और सकारात्मक सोच के साथ की थी , परंतु कुछ महीने के उपरांत ही एक भयंकर महामारी दुनियाभर में लाखों लोगों को एक बेलगाम आँधी की भांति लीलती जा रही है।

डर , सुरक्षा और उम्मीदों के उधेड़बुन में कई दिनों से ज़िंदगी सिमट सी गई है, मानो जिंदगी की असली रफ्तार और बीतता समय सब धीमा हो गया है ।

दुनिया भर में तमाम गम्भीर बीमारियां है, परंतु इस बीमारी ने सभ्यताओं को घुटने पर ला दिया, लोग घरों में बंद रहने को मजबूर है, क्योंकि शायद कोई और उपाय काम ही न आए।

प्रकृति के रोष के आगे सब कितने बेबस बन गए हैं इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि स्वयं को सुपरपावर की संज्ञा से नवाजने वाला अमेरिका आज अपने 70 हजार से ज्यादा लोग गवां चुका है।

जहाँ अपने देश मे कुल मरीजों की संख्या 60 हजार पार कर चुकी है वही अपने देश मे संक्रमित व्यक्तियों की संख्या भी रोज बढ़ती ही जा रही है।

इतनी बड़ी महामारी और इसमें हमारे राजनीतिक परिपेक्ष्य की चर्चा होनी भी आवश्यक है?

इस बात के निष्कर्ष निकलने चाहिए कि जो सत्ता लॉकडाउन लगाती है, वह अन्य क्षेत्रों एवम विषयों में अपने नागरिकों के विषय मे क्या योजनाएं रखती है ?

आज इस महामारी संकट के समय सबसे बड़ी एक और समस्या जो नित्य सोचने को मजबूर करती है वह है- उन लाचार वर्गों के पेट पालने की समस्या जो पूर्ण रूप से किसी दूसरे के यहाँ मेहनत मजदूरी के द्वारा प्राप्त आय पर निर्भर थे।

राज्यों ने आवश्यक योजनाओं को सुनिश्चित तो किया परंतु लाभ केवल कुछ वर्ग तक ही सीमित रह गए।

वही सिक्के के दूसरे पहलू को देखे तो व्यापारी वर्ग भी इस संकट से अछूते नहीं है। इस परिस्थिति में उद्योग सुचारू रूप से चलाये नही जा सकते, मालो के आयात निर्यात बंद है, लघु एवम कुटीर उद्योगों की हालत और ही खस्ताहाल है।

अपने सीमांचल के जिला किशनगंज की बात करें तो बिहार का इकलौता चायपत्ती उत्पादन करने वाला जिला है और यहाँ के कई चाय प्रसंस्करण करने वाले छोटे कारखाने और बागानों की रौनके गायब हो चुकी है।
यही हाल जिले के जूट की खेती करने वाले हो या मकई किसान, इनके महीनों की मेहनत पर कोरोना की मार भारी पड़ रही है।

जहाँ जनप्रतिनिधि गायब है, व्यवस्था सरकारी तंत्र पर ही निर्भर है, ऐसे में लोगों के हितों की बात करने वाले बाबुओं का अपने क्षेत्रों से नदारद रहना काफी विचारणीय प्रश्न बन जाता है।

बिहार सरकार ने अन्य राज्यो में फंसे हुए अपने नागरिकों के लिए मोबाइल सहायता एप के ज़रिए 1000/- रुपये सीधे उनके बैंक खाते में जमा करने की योजना शुरू की थी, जिसका लाभ कुछ अप्रवासियों को मिला, परंतु फिलहाल खबर यह है कि इस योजना की अंतिम तारीख 30 अप्रैल 2020 तक थी।(संदर्भ-aapda.bih.nic.in)।

इन तमाम खबरों के बीच कुछ राहत देने वाली खबर आई थी कि कुछ देश वैक्सीन के मानव परीक्षण करने जा रहे हैं, वहीं कुछ राष्ट्र इसके मानव निर्मित कहने की बात भी कर रहे हैं, और जैसा दागदार चीन का वामपंथी इतिहास रहा है वहीं सोशल मीडिया में चल रहे ट्रेंड्स इसे वुहान वायरस और चाइनीज वायरस का नाम भी दे रहे हैं।

कोरोना वायरस और जिंदगी के जंग में कुछ परिणाम हमे सकारात्मक विचारों के भी देखने को मिले हैं, कही विद्यार्थियों के लिए ऑनलाइन क्लासेस जैसे कॉन्सेप्ट सामने आए, तो उम्दा और लाजवाब स्वाद के चहेते घर मे ही रेस्तरां के व्यंजनों पर हाथ आजमाते मिले।

वास्तव में इस संकट ने बहुतों को मानवता के सच्चे अर्थ भी समझाए, लोगों ने आगे आकर भोजन पानी और जरूरी सामान उन लोगों को उपलब्ध कराए जो वित्तीय स्थिति से लचर और लाचार थे और यह सेवा अनगिनत स्थानों पर अब भी जारी है।

शायद हम मानवों के अब तक तमाम विभीषिकाओं में भी जीवित रहने का कारण यह जिजीविषा , समाजिकता और एक दूसरे के प्रति समर्पण भाव ही है जो अनंतकाल से हमे शक्ति दे रहा है।

धन्यवाद

Sushil
Author: Sushil

सबसे ज्यादा पड़ गई
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