किशनगंज/प्रतिनिधि
जिले के लगभग 15 गाँवों में किसानों द्वारा बायो डीकंपोज़र तकनीक का सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है, जिसके माध्यम से 2000 से अधिक किसान लाभान्वित हो रहे हैं। इस अभिनव पहल के अंतर्गत दिघलबैंक प्रखंड के लोहागढ़ा, बहादुरगंज प्रखंड के खोरा बनगामा, मालटोला बनगामा, निवेब जागीर बनगामा, मलान डिगी बनगामा, खुदागंज, ठाकुरगंज प्रखंड के चपाती, खानाबाती, नयाबादी, रजागांव तथा किशनगंज प्रखंड के पनिसाल, सिंघिया एवं तुपामारी सहित अन्य गाँवों के किसान इस तकनीक को अपना रहे हैं।
इस दिशा में कृषि विभाग के जिला कृषि पदाधिकारी प्रभात कुमार तथा प्रदान संस्थान के जिला कोऑर्डिनेटर अमित कुमार ठाकुर का उल्लेखनीय योगदान रहा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, आगामी वर्ष में इस तकनीक का विस्तार 30 से 40 गाँवों तक किया जाएगा।
इसी क्रम में, बिहार दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम के दौरान लगाए गए विभिन्न विभागीय स्टॉलों के निरीक्षण के क्रम में जिला पदाधिकारी द्वारा कृषि विभाग के स्टॉल का अवलोकन किया गया। स्टॉल में ठाकुरगंज प्रखंड अंतर्गत चपाती गाँव में उत्पादित विभिन्न प्रकार की सब्जियों का आकर्षक प्रदर्शन किया गया था। इसके साथ ही इन सब्जियों के उत्पादन में उपयोग होने वाले जैविक खाद एवं तकनीकों का भी प्रदर्शन किया गया, जिनमें वर्मी कम्पोस्ट, सुपर कम्पोस्ट के साथ-साथ बोतलों में बायो डीकंपोज़र, जीवामृत एवं बीजामृत आदि शामिल थे।
इस अवसर पर जिला पदाधिकारी ने जिला कृषि पदाधिकारी से बायो डीकंपोज़र तकनीक के संबंध में विस्तृत जानकारी प्राप्त की। उन्होंने इसके निर्माण की प्रक्रिया, उपयोग की विधि एवं फसल अवशेष प्रबंधन में इसकी उपयोगिता के संबंध में गहनता से जानकारी ली। जिला पदाधिकारी ने इसके पर्यावरणीय एवं आर्थिक लाभों की सराहना करते हुए इसे किसानों के लिए अत्यंत उपयोगी एवं लाभकारी बताया। साथ ही, उन्होंने निर्देश दिया कि जिले के अधिक से अधिक किसानों को इस तकनीक के प्रति जागरूक किया जाए, ताकि पराली प्रबंधन के साथ-साथ जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा सके।
क्या है बायो डीकंपोज़र
बायो डीकंपोज़र एक जैविक घोल है, जिसमें विशेष प्रकार के सूक्ष्मजीव (फंगस एवं बैक्टीरिया) पाए जाते हैं। यह फसल अवशेष जैसे पराली, पत्तियाँ एवं डंठल को तीव्र गति से सड़ाकर उन्हें उपयोगी जैविक खाद में परिवर्तित कर देता है। यह तकनीक विशेष रूप से पराली जलाने की समस्या के समाधान में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो रही है।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य किसानों को पराली प्रबंधन के प्रति जागरूक करना, बायो डीकंपोज़र के उपयोग की विधि का प्रशिक्षण देना, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना तथा जैविक खेती को प्रोत्साहित करना है।
बायो डीकंपोज़र घोल तैयार करने हेतु 200 लीटर पानी में 2 किलोग्राम गुड़ मिलाकर उसमें बायो डीकंपोज़र कैप्सूल या कल्चर डाला जाता है। इस मिश्रण को ढककर छाया में 5–7 दिनों तक रखा जाता है तथा प्रतिदिन एक बार हिलाया जाता है।
तैयार घोल को खेतों में फसल अवशेषों पर समान रूप से छिड़काव किया जाता है, जिसके पश्चात हल्की सिंचाई कर खेत में नमी बनाए रखी जाती है। लगभग 20–25 दिनों के भीतर अवशेष सड़कर जैविक खाद में परिवर्तित हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त, पराली, फसल अवशेष एवं गोबर को एक स्थान पर एकत्रित कर भी इस घोल के प्रयोग से खाद तैयार की जा सकती है।
इस तकनीक के उपयोग से पराली जलाने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, जिससे पर्यावरण प्रदूषण में कमी आती है। साथ ही, मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि, जैविक कार्बन की बढ़ोतरी एवं रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता में कमी आती है। इसके उपयोग से फसलों एवं सब्जियों की गुणवत्ता, चमक एवं स्वाद में भी सुधार देखा गया है।
बायो डीकंपोज़र घोल को सीधे धूप में न रखें तथा समय-समय पर इसे हिलाते रहें। छिड़काव के पश्चात खेत में नमी बनाए रखना आवश्यक है। साथ ही, इस घोल का रासायनिक पदार्थों के साथ मिश्रण नहीं किया जाना चाहिए।
बायो डीकंपोज़र एक सस्ती, सरल एवं प्रभावी तकनीक है, जो किसानों की आय में वृद्धि के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इच्छुक किसान इस तकनीक की जानकारी एवं घोल संबंधित गाँवों के किसानों अथवा अपने प्रखंड/जिला कृषि कार्यालय से निःशुल्क प्राप्त कर सकते हैं।





























