भारत–इज़राइल संबंधों की यात्रा: संकोच, सहयोग और रणनीतिक उत्कर्ष

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ऐतिहासिक जड़ें और कूटनीतिक हिचकिचाहट

भारत और इज़राइल के बीच संबंध ऐतिहासिक जन-सामान्य के जुड़ाव और प्राचीन सभ्यतागत संपर्कों पर आधारित हैं। यद्यपि भारत ने 1950 में इज़राइल को औपचारिक रूप से मान्यता दे दी थी, लेकिन पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 तक स्थापित नहीं हो पाए।
दशकों तक, अपनी गुटनिरपेक्ष विदेश नीति के कारण, भारत ने इज़राइल के साथ खुले तौर पर जुड़ने में हिचकिचाहट दिखाई। भारत–इज़राइल संबंध आज जितने मधुर हैं, हमेशा से ऐसे नहीं थे।

आतंकवाद विरोधी प्रयासों और उपनिवेशवाद के समान अनुभवों के बावजूद, भारत ने जानबूझकर इज़राइल से दूरी बनाए रखी।
स्वतंत्रता के आरंभिक दशकों में भारतीय राजनीति की कुछ सीमाओं ने दोनों देशों के बीच संभावित संबंधों को पूरी तरह साकार होने से रोका।

धर्म के आधार पर विभाजन से निकले भारत में अल्पसंख्यक भावनाओं को लेकर सत्तारूढ़ नेतृत्व सतर्क था। परिणामस्वरूप, सरकारें इज़राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी को पूरी तरह विकसित नहीं कर पाईं।

इज़राइल की लगातार मित्रता

इसके विपरीत, इज़राइल ने संकट के क्षणों में भी भारत के प्रति लगातार मित्रता का हाथ बढ़ाया। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान जब भारत को गंभीर सैन्य कमी का सामना करना पड़ा, तो इज़राइल ने तत्परता से हथियारों और गोलाबारूद की आपूर्ति की। डेविड बेन-गुरियन के नेतृत्व में, इज़राइल ने पंडित नेहरू के अनुरोध पर भारी मोर्टार और आवश्यक सैन्य सामग्री भेजी, भले ही राजनयिक संबंध उस समय ठंडे थे।


इसी तरह का समर्थन 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भी देखा गया। बिना औपचारिक संबंधों के बावजूद, इज़राइल ने भारत को 105 मिमी मोर्टार, गोला-बारूद और तकनीकी सहायता प्रदान की। गोल्डा मीर के नेतृत्व में, इज़राइल ने मुक्ति बहिनी को भी समर्थन देने की भूमिका निभाई, जिसने अंततः बांग्लादेश के निर्माण में योगदान दिया।

वैचारिक समर्थन और राजनीतिक विकास

जब भारत की तत्कालीन सरकारें इज़राइल के साथ औपचारिक संबंधों के विस्तार को लेकर संकोच की स्थिति में थीं, उस समय भारतीय जनसंघ, जो आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित हुआ, ने अपने 1967 के चुनाव घोषणापत्र में इज़राइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित करने की स्पष्ट वकालत की थी।
इसी वैचारिक निरंतरता को आगे बढ़ाते हुए वर्तमान मोदी सरकार ने भारत–इज़राइल संबंधों को नई ऊँचाई पर पहुँचाया। 2017 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी इज़राइल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने — जो भारत की विदेश नीति के विकास में एक ऐतिहासिक क्षण था।

एक विशेष रणनीतिक साझेदारी की ओर

भारत और इज़राइल के बीच गहराते संबंधों और आपसी सद्भावना को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 25 से 26 फरवरी 2026 तक अपनी दूसरी आधिकारिक इज़राइल यात्रा की। पिछले वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों ने तकनीक, साइबर सुरक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, स्वास्थ्य, उद्यमिता, रक्षा और सुरक्षा जैसे कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। इसी प्रगति के आधार पर, प्रधानमंत्री नेतन्याहू और प्रधानमंत्री मोदी ने इस साझेदारी को एक नई पहचान देते हुए इसे ‘शांति, नवाचार और समृद्धि हेतु एक विशेष रणनीतिक साझेदारी’ का दर्जा दिया।

आतंकवाद विरोध, कनेक्टिविटी और रणनीतिक मंच

इस यात्रा के दौरान आतंकवाद विरोध सहयोग का एक प्रमुख स्तंभ बना रहा। भारत और इज़राइल दोनों लंबे समय से आतंकवाद से जूझते आए हैं, जिससे दोनों के बीच समान रणनीतिक दृष्टिकोण विकसित हुआ है।


2017 की यात्रा के दौरान दोनों नेताओं का भूमध्य सागर के तट पर नंगे पांव साथ चलते हुए दृश्य केवल राजनयिक सौहार्द का प्रतीक मात्र नहीं था, बल्कि नवाचार, नेतृत्व और स्थायित्व के प्रति साझा दृष्टिकोण का भी द्योतक था। दोनों नेताओं के समक्ष विद्यमान समान राजनीतिक दबावों और जटिल सुरक्षा चुनौतियों ने पारस्परिक समझ तथा आपसी विश्वास को और अधिक सुदृढ़ किया है।


नेताओं ने I2U2 चतुष्कोणीय साझेदारी को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई, जो व्यापार, निवेश, नवाचार और पूरक क्षमताओं के उपयोग के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है। साथ ही, IMEC (इंडिया-मिडल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर) को कनेक्टिविटी, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और खाद्य उत्पादन के क्षेत्रों में मजबूत करने पर चर्चा हुई। यह गलियारा एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के बीच व्यापार और परिवहन को और कुशल बना सकता है।

व्यापार, रक्षा और निवेश: आर्थिक आयाम

1992 में राजनयिक संबंधों की स्थापना के बाद भारत और इज़राइल के बीच व्यापार में निरंतर वृद्धि हुई। जहां शुरुआती वर्षों में व्यापार केवल 200 मिलियन डॉलर था, वहीं 2022–23 में यह 10.7 बिलियन डॉलर पर पहुँच गया। हालाँकि क्षेत्रीय संघर्षों और व्यापार मार्ग में व्यवधान के कारण 2024–25 में यह घटकर लगभग 3.6 बिलियन डॉलर रहा, लेकिन दीर्घकालिक प्रवृत्ति सकारात्मक है।


वर्ष 2014–15 से भारत निरंतर व्यापार अधिशेष की स्थिति में बना हुआ है। यह अधिशेष 2022–23 में 6.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर के उल्लेखनीय स्तर तक पहुँचा तथा 2024–25 में घटकर 663 मिलियन अमेरिकी डॉलर रह जाने के बावजूद, द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों की सुदृढ़ता और स्थायित्व को रेखांकित करता है।
भारत इज़राइल के हथियारों का सबसे बड़ा आयातक बन चुका है — इज़राइल की कुल रक्षा निर्यात का लगभग 30% भारत को जाता है।


इज़राइली प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ने 2000 से सितंबर 2025 के बीच 347 मिलियन डॉलर को पार कर लिया है, जिसमें से 300 मिलियन डॉलर से अधिक तकनीकी क्षेत्र में निवेशित हैं। साथ ही, भारतीय कंपनियों ने भी साइबर सुरक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी क्षेत्रों में इज़राइली तकनीकी कंपनियों में निवेश बढ़ाया है।

साझा लोकतांत्रिक मूल्य और क्षेत्रीय शांति

क्नेस्सेट (इज़राइली संसद) में अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की आतंकवाद पर ज़ीरो टॉलरेंस की नीति को दोहराया। उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा किए गए हमले की निंदा करते हुए उसे एक बर्बर आतंकी हमला कहा जिसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया।


उन्होंने इज़राइल के पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के साथ अब्राहम समझौते जैसे प्रयासों की सराहना की और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की गाजा शांति पहल में भारत के समर्थन को दोहराया।


प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि भारत हमेशा से यहूदी परिवारों के लिए सम्मान और समरसता का घर रहा है। केरल, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र स्थित ऐतिहासिक यहूदी समुदायों का उल्लेख करते हुए उन्होंने भारत की बहुसांस्कृतिक, सहिष्णु तथा समावेशी परंपराओं को भारत–इज़राइल संबंधों की आधारशिला के रूप में रेखांकित किया।

विश्वास और यथार्थवाद से निर्मित साझेदारी

भारत–इज़राइल संबंधों का यह विकास एक ऐसी यात्रा का प्रतीक है जो कूटनीतिक हिचकिचाहट से रणनीतिक आत्मविश्वास तक पहुँची है। ऐतिहासिक सद्भाव, रक्षा सहयोग, व्यापार एवं प्रौद्योगिकी में विस्तार और साझा लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित यह साझेदारी आज एक सुदृढ़ नींव पर खड़ी है।


जैसे-जैसे दोनों देश एक जटिल वैश्विक परिदृश्य से गुजर रहे हैं, उनका सहयोग अब केवल द्विपक्षीय हितों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह क्षेत्रीय स्थिरता और नवाचार आधारित विकास में भी योगदान दे रहा है।


‘शांति, नवाचार और समृद्धि हेतु एक विशेष रणनीतिक साझेदारी’ का दर्जा केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि समय, विश्वास और राजनीतिक दृढ़ संकल्प से परिपक्व हुए संबंधों की स्वाभाविक प्रगति है।

परिचय – श्रेष्ठ कुमार एक विधि छात्र हैं और वर्तमान में भारत के सर्वोच्च न्यायालय में इंटर्नशिप कर रहे हैं।

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