सीनियर जर्नलिस्ट/ प्रवीण गोविंद
मिरदौल (अररिया): मंगलवार की वह भोर मिरदौल के लिए केवल एक नई सुबह नहीं थी, बल्कि सनातन की उन जड़ों की ओर वापसी थी, जहां ‘संस्कार’ और ‘संकल्प’ का संगम होता है। समाजसेवी दिलीप ठाकुर और सुनील ठाकुर के गृह-आंगन में जब मंत्रोच्चार की गूंज उठी, तो लगा मानो अररिया की सीमाओं को लांघकर ‘मिथिलांचल’ की आध्यात्मिक सुवास और शास्त्रीय मर्यादा मिरदौल की गलियों में जीवंत हो उठी हो। अवसर था—भागेश्वर ठाकुर के पौत्रों, मानस कुमार और रौनक ठाकुर के ‘उपनयन’ संस्कार एवं पावन ‘एकादशी यज्ञ’ के उद्यापन का।

उपनयन: ब्रह्मचर्य से बोध तक की यात्रा
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो उपनयन (जनेऊ) केवल सूत के तीन धागों को धारण करना नहीं है, बल्कि यह बालक का ‘दूसरा जन्म’ है। यह अज्ञान के अंधकार से गुरु के सान्निध्य में ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने का पहला कदम है। मानस और रौनक के कांधे पर चढ़ा यज्ञोपवीत इस बात का उद्घोष है कि अब वे केवल परिवार के पुत्र नहीं, बल्कि समाज और शास्त्र के रक्षक बनने की राह पर अग्रसर हैं। यह ब्रह्मचर्य की वह दीक्षा है, जो चंचल मन को अनुशासन के अंकुश से बांधती है।

एकादशी यज्ञ: इंद्रियों पर विजय का अनुष्ठान
इस आयोजन की भव्यता को आध्यात्मिक पूर्णता दी ‘एकादशी यज्ञ’ ने। एकादशी का व्रत और उसका उद्यापन, मन और इंद्रियों को सांसारिक कोलाहल से खींचकर परमात्मा के चरणों में एकाग्र करने की एक दुर्लभ प्रक्रिया है। दिलीप ठाकुर और सुनील ठाकुर ने इस अनुष्ठान के माध्यम से यह संदेश दिया है कि आधुनिकता की दौड़ में भी हमारी आत्मा केवल ईश्वर के सान्निध्य में ही शांति पा सकती है।
पीतांबरधारी ब्राह्मणों का संगम: साक्षात मिथिला का पावन दृश्य
मिरदौल की धरती उस समय धन्य हो उठी जब पीत वस्त्र (पीली धोती और गमछा) धारण किए सैकड़ों ब्राह्मणों का जमावड़ा हुआ। जब ये प्रबुद्धजन पंक्तिबद्ध होकर भोजन के लिए बैठे, तो वह दृश्य साक्षात मिथिला की महान ‘विद्वत परंपरा’ की याद दिला गया। ब्राह्मण भोजन और सत्कार के उपरांत उन्हें श्रद्धापूर्वक विदा करना, सनातन की ‘दान’ और ‘सेवा’ की उस महान परंपरा का पुनर्जीवन है, जो आज के स्वार्थी दौर में विलुप्त होती जा रही है।
निष्कर्ष: दिखावा नहीं, यह तो जड़ों का संरक्षण है
जहां आज समाज फिजूलखर्ची और शोर-शराबे में डूबा है, वहीं मिरदौल का यह आयोजन एक ‘मौन आंदोलन’ की तरह दिखा, जहां परंपराओं की गरिमा सर्वोपरि थी। क्षेत्र के प्रबुद्धजनों की उपस्थिति ने इस बात पर मुहर लगा दी कि जब संस्कार जीवंत होते हैं, तो पूरा इलाका एक तीर्थ बन जाता है। मानस और रौनक के रूप में दो नए ‘द्विज’ समाज को मिले हैं, जो आने वाले समय में ज्ञान की मशाल जलाए रखेंगे।
आस्था का अनुष्ठान: संकल्प की शक्ति
जहां संस्कारों की नींव मज़बूत होती है, वहां भक्ति स्वयं अपना मार्ग बना लेती है। मिरदौल में आयोजित इस एकादशी यज्ञ की पूर्णाहुति केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक कठिन साधना का प्रतिफल है। इस महायज्ञ की मुख्य वेदी पर श्रद्धेय भागेश्वर ठाकुर की अर्धांगिनी श्रीमती मंजुला देवी ने मुख्य यजमान के रूप में बैठकर अपने अटूट संकल्प और भक्ति का परिचय दिया। सनातन धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है, और श्रीमती मंजुला देवी का यह आध्यात्मिक समर्पण न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा का केंद्र बना हुआ है।
























