वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मोक्षदायिनी मां गंगा कि दिव्य गंगा आरती पूजन, वंदन की है परम्परा
डाॅ.मिथिलेश झा /कटिहार – ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला गंगा दशहरा सनातन धर्म का अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन राजा भगीरथ की कठोर तपस्या और अथक प्रयास से मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं।
इस पर्व को श्रद्धा,आस्था और पुण्य प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान, पूजन, दान एवं आरती करने से मनुष्य को दैहिक,दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति मिलती है। साथ ही पापों का नाश होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा पूर्वजों की आत्मा को सद्गति मिलती है।
धार्मिक कथाओं के अनुसार अयोध्या के राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था। यज्ञ का घोड़ा इंद्र द्वारा कपिल मुनि के आश्रम के समीप बांध दिया गया। घोड़े की खोज करते हुए राजा सगर के साठ हजार पुत्र वहां पहुंचे और कपिल मुनि पर आरोप लगाने लगे। इससे क्रोधित होकर ऋषि के श्राप से सभी पुत्र भस्म हो गए।
उनके उद्धार और आत्मा की शांति के लिए राजा भगीरथ ने वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्मा ने मां गंगा को पृथ्वी पर जाने की अनुमति दी। गंगा के प्रचंड वेग को धारण करने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में समाहित किया और फिर पृथ्वी पर प्रवाहित किया। मां गंगा के पवित्र जल के स्पर्श से सगर पुत्रों को मुक्ति प्राप्त हुई।
गंगा दशहरा के अवसर पर गंगा घाटों और मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। लोग गंगा स्नान कर पूजा-अर्चना, दीपदान और दान-पुण्य करते हैं। विभिन्न स्थानों पर भजन-कीर्तन,धार्मिक अनुष्ठान और गंगा आरती का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु मां गंगा से सुख , शांति, समृद्धि और परिवार के कल्याण की कामना करते हैं। मनिहारी पावन गंगातट पर भी आस्था की डुबकी लगाने श्रद्धालुओं को जन सैलाब हर वर्ष उमडता है। मनिहारी नगर मुख्य पार्षद व नगर प्रशासन की ओर से इस पावन अवसर पर महा गंगा आरती व दीन दान अनुष्ठान का कार्यक्रम निर्धारित है।























