मधुबाला मौर्या
सोच रही हु किसपे लिखू
कवि पर या कविता पर
व्याकुल मन अधीर हो बैठा
खोजने चली जब दिनकर को ,
एक समय था
आज की नहीं बीते हुए कल की,
एक महादेवी देवी वर्मा थी दूजे
हरिवंशराय बच्चन जी ,
समय समय के अविरल कवि
तब के कविता मे ,रस –
संगीत -लय और ताल थी,
जीवन जीने की सीख थी ,
अब के कवि मिलते है
हर घर ,गली,और चौपाल पर
किराने की दूकान पर
कविता कम हास्यास्पद ज़्यादा ,
माइक पर चिल्लाना
दर्शकों को हँसाना
आज के कवियों का
बस यही हैं फ़साना
अब तो न कविता होती है न कविता मे रस होता है
न लय होती हैं न ताल
न कृष्णा होते हैं न गोपिया होती है
बासुरी बजती है पर गईया नहीं होती है।
Post Views: 298
1 thought on “कविता :आज के अविरल कवि”
शानदार व्यंग्य
Comments are closed.