किशनगंज /प्रतिनिधि
गिलोय के पौधे के महत्व के संबंध में उद्यानिकी अनुसंधान संस्थान के कनीय वैज्ञानिक डा मुकुल कुमार एवं डा अखिलेश कुमार सिंह ने जिले के अलग अलग गांव से पहुंचे किसानों को अवगत करवाया।श्री कुमार ने बताया कि “औषधीय गुणों से भरपूर गिलोय – किसान और स्वास्थ्य दोनों का हितैषी” एक बहुवर्षीय, पर्णपाती, चढ़ने वाली बेल है, जिसे आयुर्वेद में “अमृता” और “गुडुची” के नाम से जाना जाता है। यह भारतीय चिकित्सा पद्धति में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली श्रेष्ठ औषधियों में गिनी जाती है।
गिलोय का महत्व केवल औषधीय उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी खेती किसानों को कम लागत में अधिक लाभ भी प्रदान करती है। वर्तमान समय में, जब स्वास्थ्य के प्रति लोगों की जागरूकता बढ़ रही है, गिलोय की मांग देश-विदेश में तेजी से बढ़ रही है।औषधीय महत्व गिलोय का उपयोग प्राचीन काल से विभिन्न रोगों के उपचार में किया जा रहा है। वैज्ञानिकों ने कहा कि आयुर्वेद में इसे त्रिदोषनाशक, बल्य, आयुष्यवर्धक और रक्तशोधक माना गया है। गिलोय का सेवन शरीर की प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाता है, जिससे व्यक्ति सामान्य संक्रमणों से सुरक्षित रहता है।इसके सेवन से ब्लड शुगर लेवल नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। डेंगू, मलेरिया और वायरल बुखार में यह प्राकृतिक ज्वरनाशक के रूप में लाभकारी है।
गिलोय का रस पाचन क्रिया को दुरुस्त करता है और कब्ज जैसी समस्याओं को कम करता है।जोड़ों के दर्द में राहत: इसके काढ़े का सेवन गठिया और जोड़ों के दर्द में आराम देता है।गिलोय की खेती देश के अधिकांश हिस्सों में आसानी से की जा सकती है।उपोष्णकटिबंधीय और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की जलवायु इसके लिए सर्वश्रेष्ठ है।
25°C से 35°C का तापमान इसकी बढ़वार के लिए उपयुक्त है। हल्की, दोमट मिट्टी जिसमें पानी का निकास अच्छा हो, सर्वोत्तम रहती है। pH 6-7.5 के बीच होना चाहिए।गिलोय की खेती का सबसे आसान तरीका इसकी बेल की 30-45 सेमी लंबी पेंसिल मोटाई की कलम (स्टेम कटिंग) से प्रवर्धन करना है।
कलम को वर्षा ऋतु या वसंत ऋतु में लगाया जाए तो जीवित रहने की संभावना अधिक होती है।
प्रत्येक कटिंग में कम से कम 2-3 गांठें (nodes) होनी चाहिए रोपण से पूर्व कटिंग को कार्बेन्डाजिम (0.1%) घोल में 5-10 मिनट डुबोकर रोगमुक्त करना लाभकारी है।
खेत को अच्छी तरह जोतकर समतल कर लें और 5-10 टन गोबर की खाद प्रति एकड़ मिलाएं 2 मीटर × 2 मीटर की दूरी पर रोपाई करें। गिलोय एक लता प्रजाति है, इसलिए इसे चढ़ने के लिए मचान या सहारे की आवश्यकता होती है।
गर्मी में 15 दिन के अंतराल पर तथा सर्दी में 25-30 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें। वर्षा ऋतु में अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। प्रति पौधा सालाना 2-3 किलोग्राम गोबर की खाद और 50-60 ग्राम नाइट्रोजन, 40 ग्राम फास्फोरस एवं 40 ग्राम पोटाश देना पर्याप्त है।
गिलोय में सामान्यतः रोग और कीट कम लगते हैं, लेकिन कभी-कभी पत्ती धब्बा रोग या एफिड्स की समस्या हो सकती है।
पत्ती धब्बा रोग: कार्बेन्डाजिम (0.1%) या मैन्कोज़ेब (0.25%) का छिड़काव करें। एफिड्स: नीम आधारित कीटनाशी (5 मिली/लीटर पानी) का छिड़काव प्रभावी है।
रोपण के 8-10 महीने बाद से तनों की कटाई शुरू की जा सकती है।
कटाई के लिए तने को तेज धारदार औजार से काटें, जिससे पुनः नई शाखाएं निकल सकें।
कटाई के बाद तनों को 30-40 सेमी टुकड़ों में काटकर धूप में सुखाया जाता है।
गिलोय पाउडर, रस, कैप्सूल, सिरप, चूर्ण, और टैबलेट के रूप में प्रसंस्कृत किया जा सकता है।
बाजार में सूखी गिलोय 60-80 रुपये प्रति किलोग्राम और पाउडर 150-200 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकती है।
आयुर्वेदिक दवा उद्योग, हर्बल कंपनियां, वेलनेस सेंटर और आयुर्वेद चिकित्सालय गिलोय के प्रमुख खरीदार हैं। घरेलू उपयोग के साथ-साथ इसका निर्यात भी किया जाता है।
एक हेक्टेयर में गिलोय की खेती से किसानों को प्रति वर्ष 1.5 से 2 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ मिल सकता है।
गिलोय न केवल स्वास्थ्य संवर्धन का प्राकृतिक स्रोत है, बल्कि किसानों के लिए आय का भरोसेमंद साधन भी है। न्यूनतम लागत, कम देखभाल और बढ़ती मांग इसे एक अत्यंत लाभकारी औषधीय फसल बनाती है। यदि किसान वैज्ञानिक पद्धति से इसकी खेती करें और प्रसंस्करण व मूल्य संवर्धन की दिशा में कदम बढ़ाएं, तो गिलोय उन्हें आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ समाज के स्वास्थ्य को भी सशक्त बनाने में मदद करेगी।अलग अलग प्रखंडों से पहुंचे किसानों को खेती करने की जानकारी दी गई जिससे किसान काफी लाभांवित हुए।