कटिहार-जिला कृषि पदाधिकारी राजीव कुमार चालू खरीफ मौसम में धान की बेहतर पैदावार को लेकर सजग और सक्रिय हैं। उनके द्वारा किसानों को निरंतर उपयोगी सलाह दी जा रही है। श्री कुमार ने किसानों से धान की बेहतर उपज के लिए संतुलित एवं अनुशंसित मात्रा में उर्वरकों के उपयोग की अपील की है।
उन्होंने कहा कि धान की उपज का मुख्य आधार प्रति इकाई क्षेत्र में उत्पादक कल्लों टिलर्स की संख्या होती है। रोपाई के 20 से 45 दिन का समय कल्ला निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण अवधि माना जाता है। इस दौरान संतुलित पोषण, उचित जल प्रबंधन, समय पर निराई-गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण अपनाने से अधिक संख्या में स्वस्थ एवं उत्पादक कल्ले विकसित होते हैं।
डीएओ ने बताया कि कल्ले बढ़ाने में नाइट्रोजन सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व है। यूरिया की पहली टॉप ड्रेसिंग रोपाई के 20 से 25 दिन बाद तथा दूसरी 40 से 45 दिन बाद करनी चाहिए। खेत में हल्की नमी या 2 से 3 सेंटीमीटर पानी रहने पर ही यूरिया का प्रयोग करें।
उन्होंने रोपाई से पहले फॉस्फोरसयुक्त उर्वरकों के उपयोग, पोटाश से पौधों की मजबूती, जिंक की कमी होने पर 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर जिंक सल्फेट तथा सल्फर के संतुलित उपयोग की भी सलाह दी।उन्होंने कहा कि धान की रोपाई के समय किसी कारणवश डीएपी का उपयोग नहीं हो सका तो रोपिई के 10-15 दिन बाद, जब धान के पौधे की जडें पूरी तरह स्थापित हो जाय, तब खेत मे पर्याप्त नमी की दशा मे तब डीएपी का उपयोग टाप ड्रेसिंग के रुप मे किया जा सकता है।
उन्होने कहा कि रोपाई के दौरान पौधे से पौधे की अनुशंसित दूरी बनाए रखें, प्रति स्थान 2 से 3 स्वस्थ पौधों की रोपाई करें तथा मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करें। जैव उर्वरक एवं अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद का उपयोग भी लाभकारी है।डीएओ ने किसानों को आगाह किया कि केवल अधिक मात्रा में यूरिया देने से उत्पादन नहीं बढ़ता, बल्कि पौधे कमजोर होकर गिरने के साथ कीट एवं रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि नाइट्रोजन, फॉस्फोरस,पोटाश, जिंक और सल्फर का संतुलित उपयोग ही अधिक उत्पादक कल्लों एवं बेहतर उपज का आधार है।


























