मंत्र हूं – दुष्यंत कुमार
मंत्र हूँ तुम्हारे अधरों में मैं!एक बूँद आँसू में पढ़कर फेंको मुझकोऊसर मैदानों परखेतों खलिहानों परकाली चट्टानों पर….।मंत्र हूँ तुम्हारे अधरों में मैं आज अगर चुप हूँधूल भरी बाँसुरी सरीखा स्वरहीन, मौन;तो मैं नहींतुम ही हो उत्तरदायी इसके।तुमने ही मुझे कभीध्यान से निहारा नहीं,छुआ या पुकारा नहीं,छिद्रों में फूँक नहीं दी तुमने,तुमने ही वर्षों सेअपनी … Read more