मैं अश्कों में बहतें तराने लिखूंगी -निधि चौधरी

मैं अश्कों में बहतें तराने लिखूंगी,बुरे दौर के कुछ फ़साने लिखूंगी। कि दुनिया हमारी है जालिम बहुत ही,वो मासूम दिखते सयाने लिखूंगी। सदाकत, रफ़ाक़त, मुहब्बत हमारी,ये सारे कुचलते ज़माने लिखूंगी। सिकंदर हज़ारों ज़माने में लेकिन,मैं हारे हुए दास्ताने लिखूंगी। इबादत है बिकती हां भक्ति भी बिकती,मैं सच बोलते वो मय’खाने लिखूंगी। ज़मीं से उठा के … Read more

परवीन शाकिर की तीन बेहतरीन रचनाएं

(१) उलझन रात भी तन्हाई की पहली दहलीज़ पे हैऔर मेरी जानिब अपने हाथ बढ़ाती हैसोच रही हूंउनको थामूंज़ीना-ज़ीना सन्नाटों के तहख़ानों में उतरूंया अपने कमरे में ठहरूंचांद मेरी खिड़की पर दस्तक देता है (२)बारिश बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की!उसे बुला जिसकी चाहत मेंतेरा तन-मन भीगा हैप्यार की बारिश से बढ़कर क्या बारिश होगी!और … Read more

पिंजरे में मुनिया – अकबर इलाहाबादी

मुंशी कि क्लर्क या ज़मींदार लाज़िम है कलेक्टरी का दीदार  हंगामा ये वोट का फ़क़त है मतलूब हरेक से दस्तख़त है हर सिम्त मची हुई है हलचलहर दर पे शोर है कि चल-चल टमटम हों कि गाड़ियां कि मोटरजिस पर देको, लदे हैं वोटर शाही वो है या पयंबरी हैआखिर क्या शै ये मेंबरी है … Read more