वह धीर है गंभीर है -हर्ष कुमार की कविता
किस तरह पुरुष कठोर होकर, अपनो से दूर रहता है, अपनों से दूर होकर भी अपनो के लिए सबकुछ करता है, वो मर्द है और दर्द उसे भी होता है सफर शुरू होता है उसका जैसे ही,कुछ पढ़ने, कमाने बाहर निकल पड़ता है।सभी की आँखों का तारा अब माँ की याद में सुबक सुबक रो … Read more