आशा का दीपक – रामधारी सिंह दिनकर
वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है;थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है।चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से;चमक रहे पीछे मुड़ देखो चरण-चिह्न जगमग से।बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है;थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है।☼ ☼ ☼ अपनी … Read more