मधुबाला मौर्या
इस शीर्षक को जब- जब देखती हु तो बचपन का वो लम्हा याद आ जाता है जब मैं छोटी थी यही क्लास फोर या फाइव में पढ़ती रही होंगी, एक दिन कॉलोनी में पुलिस की गाड़ी देखी तो पिताजी के पास दौड़ के गयी और बोली की पापा -पापा मुझे पुलिस ऑफिसर बनना है, पिताजी मुझे एकटक देखते हुए पूछे पुलिस ऑफिसर ही क्यों बनना है?
मैंने कहा मुझे उनकी ड्रेस और गाड़ी देखकर अच्छा लगता है तब पिताजी बोले पर जानती हो इसके लिये बड़ी मेहनत करनी होगी सुबह भोर में प्रतिदिन उठना होगा, तीन -चार घंटे रोज पढ़ना होगा, शाम को भी पढ़ना होगा मैंने पुरे जोश और आत्मविश्वास के साथ दृढ़ता पूर्वक बोला मैं करूँगी, फिर रात में दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास के साथ चोर पुलिस पकड़ने के सपने के साथ कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला और जब उठी तो पता चला स्कूल के लिये लेट हो रही,
किन्तु पुरा दिन मुझे अच्छा नहीं लग रहा था गेम पीरियड में भी क्लास से बाहर नहीं गयी और फिर नई -नई तरकीबें सोचने लगी की सुबह भोर में कैसे उठु और शाम को कबसे पढ़ने बैठु यहाँ तक सोचा की अबसे फ्री पीरियड में पढ़ूँगी,क्या -क्या उधेड़बुन के साथ स्कूल बिता पता नहीं पर छुट्टी के बाद लेकिन मित्रों घर जाकर भोजन करके सोने में जो मजा है वो पुलिस की वर्दी में कहाँ है? इसलिए फिलहाल सोते-सोते सोचती हु की क्या -क्या करूँ जिसे नींद में बाधा भी न उत्पन्न हो और पुलिस अफसर भी बन जाऊँ
तो दोस्तों अब आप समझे की क्यों ये शीर्षक मुझे ये एहसास कराता रहा की सपने मेरे आसमान जितने और विमान मेरे कागज के,
Comments are closed.