सद्गुरु की दया से मोक्ष संभव -स्वामी ज्ञान शेखर जी महाराज

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टेढ़ागाछ/किशनगंज/विजय कुमार साह

टेढ़ागाछ प्रखंड अंतर्गत मटियारी पंचायत स्थित मटियारी हाट मैदान में आयोजित दो दिवसीय संतमत सत्संग का विशेषाधिवेशन के प्रातः कालीन एवं संध्या कालीन सत्संग में बुधवार को महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज के शिष्य स्वामी ज्ञान शेखर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि कृपा की दृष्टि से जिस जीव को सद्गुरु देख ले एक ही क्षण में उसको निर्वाण प्राप्त हो जाएगा।

सत्संग में आने से सारे दुर्लभ पदार्थ भी सुलभ हो जाता है। सत्संग से ज्ञान और बुद्धि मिलते हैं। जिससे जीव का कल्याण होता है। उन्होंने सत्संग के अंतिम चरण में अपने प्रवचन में कहा कि सत्संग भजन के बिना मानव का कल्याण नहीं होता, मानव को सदाचार का पालन करना तथा पांच पापों से दूर रहना चाहिए। सत्संग अधिवेशन में उन्होंने कहा परम प्रभु परमात्मा ने हम लोगों को ज्ञानेंद्रियां और कर्म इंद्रियां दी हैं। कर्म इंद्रियों से ज्ञान इंद्रियों को विशेष माना जाता है। परमात्मा या ईश्वर को हम कैसे जानें?

जानने के पहले विचार कर लें कि ईश्वर क्या हैं, कैसे हैं? ईश्वर को कोई सगुण भी कहता है। सगुण जो गुण सहित हो। रजोगुण उत्पन्न करने वाला, सतोगुण पालन करने वाला और तमोगुण विनाश करने वाला। इन तीनों शक्तियों का जो मेल होता है,वही सगुण होता है। ईश्वर को किसी ने देखा नहीं है और ईश्वर की प्रतिमा देखना चाहते हो, तो गुरु को देखो। बिनु गुरु होई ना ज्ञान। बिना गुरु के ज्ञान नहीं होता। गुरु सात प्रकार के होते हैं। प्रथम गुरु हैं माता-पिता। रज बिरज की सोई दाता।। दूसर गुरु है मन की धाई। गिरह वास की बंध छुड़ाई।।तीसर गुरु जिन धारिया नामा।लै लै नाम पुकारै गामा।। चौथा गुरु जिन शिक्षा दीन्हा। जग व्यवहार सभै तब चीन्हा।। पंचम गुरु जिन वैष्णव कीन्हा। रामनाम का सुमिरन दीन्हा।। छठे गुरु जिन भरम गढ़ तोड़ा। सुविधा मेटि एक से जोड़ा।। सातवें गुरु जिन सतशब्द लखाया।जहाँ का तत्व सो तहाँ समाया।। कबीर सतगुरु संसार में, सेवक सब संसार। सतगुरु सोई जानिये, जो भवजल उतारे पार।। सतगुरु वे होते हैं जिनकी बुद्धि सम हो जाती है।वे आत्मा और परमात्मा को तत्व रूप में जो एक हैं, सो देखते हैं। यह अपनी बुद्धि में रखने की बात है। गुरु को ईश्वर का रूप जानकर ध्यान करो इसके बाद बहुत बारीक ध्यान है। जिसको बिंदु ध्यान कहते हैं। बिंदु का स्थान है पर परिणाम लंबाई चौड़ाई कुछ नहीं है। दृष्टि योग करने पर जो शब्द होता है, वह बाहर का शब्द नहीं है। वह अंदर का शब्द है। अंदर का शब्द ईश्वर को पकड़ा देता है और ऐसा पकड़ा देता है कि पकड़ने वाला और ईश्वर में कुछ भिन्नता नहीं रहती है। ऐसा होने से परमसुख हो जाता है। यही प्रक्रिया संतमत का साधन है।

यही संतमत में बतलाया जाता है, लोगों को चाहिए कि जो साधन बतलाया जाये, वह करते जाएं करते जाएं इसकी नींव पड़ जाए। वह जन्म जन्म में छोड़ेगा नहीं होते होते किसी एक जन्म में ऐसा होगा कि जब जन्म ही खत्म हो जाएगी। इसी को समझिए और बारंबार सत्संग कराते रहिए।इस अवसर पर भारी संख्या में सत्संग प्रेमी व श्रद्धालु सतसंग पंडाल में एकाग्रचित्त होकर अमृत प्रवचन का लाभ उठाया।इसके साथ ही भक्तिमय माहौल में सत्संग सम्पन हो गया। इस सत्संग अधिवेशन को सफल बनाने के लिए स्थानीय सत्संग प्रमियों ने सराहनीय योगदान दिया।सभी स्थानीय ग्रामीण एवं आयोजक संत परिवार के लोगों ने श्रद्धालुओं के लिए भव्य पंडाल व अन्य सुविधाओं में जुटे रहे।

सद्गुरु की दया से मोक्ष संभव -स्वामी ज्ञान शेखर जी महाराज