(1) रावण का वध स्वयं करूँगी
चलना सड़कों पर भी अब मुहाल हुआ,
कुचले पुष्प सा तेरा हाल हुआ,
खुद की खुशियों का खुद भी हिस्सा बन,
तू शिलालेख सा स्वर्णिम किस्सा बन,
तू चंडी बन तू दुर्गा बन,
रावण का वध स्वयं करूँगी,
कहने वाली सीता बन।
लाख द्रोपदी लुटती जाए,
चिथड़े काया की उड़ती जाए,
अब ना कोई वृंदावन या वंशीवाला,
यहाँ ना कोई लक्षमण जैसा पहरेवाला,
तू स्वतंत्र बहने वाली सरिता बन,
रावण का वध स्वयं करूँगी,
कहने वाली सीता बन।
चौराहे पर तुझको तार तार किया,
दुष्टों ने तुझ पर जुल्म हर बार किया,
शिशु रूप में भी इन चीलों की भोजन बन जाती है,
किलकारी से तू रुदन बन जाती है,
कर के पान गरल का तू अमृता बन,
रावण का वध स्वयं करूँगी,
कहने वाली सीता बन।
तू अग्नि बन तू ज्वाला बन,
तू सरल विष का प्याला बन,
तू खुद में एक रिसाला बन,
तू स्वच्छंद कहने वाली कविता बन,
रावण का वध स्वयं करूँगी,
कहने वाली सीता बन।
नखों में अब पैनी धार कर,
नरमुंडों का शृंगार कर,
रक्तवर्ण सा अलंकार कर,
तू चंडी बन तू दुर्गा बन,
तू कृष्ण की पावन गीता बन,
रावण का वध स्वयं करूँगी,
कहने वाली सीता बन।
निधि चौधरी
किशनगंज, बिहार
(2) बेटी
सिसकती तड़पती बिलखती है बेटी,
यहां हर कदम रोज़ लुटती है बेटी।
बयां क्या करूँ मैं दरिदों की खसलत,
जन्म लेने से पहले ही मरती है बेटी।
वो कान्हा वो मोहन कहाँ खो गए हैं,
यहाँ द्रोपदी सी, न बचती है बेटी।
ये सच है इसी के ही दम से गुलशन,
मग़र कुछ दरिन्दों को खलती है बेटी।
ये लक्ष्मी है घर की खुदा की है रहमत,
तो सीता सी क्यों फिर जलती है बेटी।
है ममता की मूरत, है मासूम सूरत,
मुहब्बत को फिर क्यों तरसती है बेटी।
बना दे इन्हें जो निधि ये ज़माना
फूलों सी फिर तो महकती है बेटी।
निधि चौधरी
किशनगंज, बिहार
(3) गीत सृजन/मैं ही दुर्गा भवानी हूँ/निधि चौधरी
कभी शबरी सी मैं निश्छल कभी झांसी की रानी हूँ।
मैं ही बेटी, मैं ही माँ हूँ, मैं ही दुर्गा भवानी हूँ ।
न मारो कोख में मुझको मैं तो गुड़िया सी प्यारी हूँ,
हूँ किस्सा मैं तेरा बाबा, कहानी भी तुम्हारी हूँ,
बुढ़ापे की तेरी लाठी, बनूँगी मैं भी भईया सी-
ज़रा सा नेह दे दो तो, मैं बेटों पर भी भारी हूँ,
नहीं डरना मेरे बाबा,तेरी लाडो सयानी हूँ ।।
मैं ही बेटी, मैं ही माँ हूँ, मैं ही दुर्गा भवानी हूँ।
अंधेरी रात सड़कों पर किसी ने था मुझे घेरा
कभी ज़िंदा जलाया तो, कभी नोचा है तन मेरा
नज़र डाली है जब तूने किसी मासूम बच्ची पर-
हुई ना आंख नम तेरी, पसीजा दिल नहीं तेरा
बताऐ अंत जो तेरा मैं वो आकाश वाणी हूँ ।।
मैं ही बेटी, मैं ही माँ हूँ, मैं ही दुर्गा भवानी हूँ।
हवाओं को जो महका दूँ, मैं वो आँगन की तुलसी हूँ,
कि रहमत हूँ खुदा की मैं, तुम्हारे घर की लक्ष्मी हूँ।
पराया धन समझ कर तो विदा बाबा ने कर डाला-
पराए घर से आई हूँ, यहां भी रोज़ सुनती हूँ।
मगर अपनाऐ जो सबको मैं वो गंगा का पानी हूँ ।।
मैं ही बेटी, मैं ही माँ हूँ, मैं ही दुर्गा भवानी हूँ।
बनूँ जब द्रोपदी तो युद्ध की ललकार हूँ सुन लो,
पढो जो तुम मुझे तो मैं, ही गीता सार हूँ सुन लो।
मैं सिंधु भी, मैं मीरा भी, मैं लवलीना भी बन जाऊं-
झुके ना ज़ुल्म के आगे, मैं वो तलवार हूँ सुन लो।
जो शत्रु जीत ना पाऐ मैं ऐसी राजधानी हूँ ।।
मैं ही बेटी, मैं ही माँ हूँ, मैं ही दुर्गा भवानी हूँ ।
कभी शबरी सी मैं निश्छल,कभी झांसी की रानी हूँ,
मैं ही बेटी, मैं ही माँ हूँ, मैं ही दुर्गा भवानी हूँ।
निधि चौधरी
किशनगंज, बिहार
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Sundar satik
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