“सेक्कूल्लर’वाद” : एक कथा

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मनोज कुमार झा


नेताजी के लिए “सेक्कूल्लर’वाद” ही सब कुछ था। उनका जीवन, उनका दर्शन और यहां तक कि उनकी आजीविका का भी इकलौता आधार।
नेताजी थे, तो जाहिर है व्यवसाय राजनीति ही था, और नेता जी इसमें सफल थे । सफल व्यवसाई भी कह सकते हैं नेताजी को। नेताजी के इस व्यवसाय में नेताजी का सबसे बड़ा सीक्रेट, और सबसे बड़ा औजार था “सेक्कूल्लर’वाद”।


नेताजी एक सच्चे और ‘घुटे-हुए’ किसिम के सेक्कूल्लरवादी थे। हमेशा, (यहाँ तक कि नींद में भी) सदैव “गंगा-जमुनी” बातें करते, ईद-बकरीद पर ख़ास टोपी में हमेशा फ्रंट पेज पर उनकी फोटू छपती, कभी रोजे तो नहीं रखे, पर कभी इफ्तारी पार्टियां देना नहीं भूलते।एक लम्बे समय से ऐसा था कि इलाके के एक धर्म विशेष के लोग, क़ानून के हिसाब से जिन्हें हम ‘अमुक’ धर्म के लोग कह सकते हैं, थोक भाव में उन्हें ‘भोंट’ दे देते थे, और वे हर बार आसानी से चुनाव जीत जाते।बार-बार, आसानी से चुनाव जीतने के कारण, ऊंचे से ऊंचे ओहदों पर गए नेताजी। मगर साहब, ईश्वर झूठ न बुलवाए, एक बात बड़ी ख़ास थी नेताजी में।जनता चाहे जिस किसी भी जाति/ धर्म/ या लिंग की हो, अगर वो किसी भी एंगल से वाकई में जनता है, तो नेताजी के द्वार उनके लिए सदैव ही खुले होते थे। नेताजी के दरबार में जनता के लिए किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं था। नेताजी के लिए सारे लोग पूरी तरह एक समान थे।







जिसको भी, जैसा भी, जो भी, काम हो, — हर काम को कराने के लिए निश्चित कमीशन तय था नेताजी का। आप बस वो कमीशन दे दीजिए और निश्चिंत होकर घर चले जाइए। चाहे आप किसी भी जाति/धर्म या लिंग के हों।


नेताजी का यह कारोबार लम्बे समय तक निर्बाध चलता रहा। नेताजी अधेड़ावस्था के आखिरी चरण में पहुँचने लगे थे। पर जैसा कि हर व्यापार का नियम है, व्यापार में उतार-चढ़ाव, अच्छे- बुरे दिन आते हैं। नेताजी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, कारोबार एकदम से जैसे पूरी तरह उतार पर आ गया। “सेक्कूल्लर’वाद” की जगह एक नई चीज आ गयी थी मार्किट में जो बड़ी पॉपुलर हो गई थी । नाम भी भला सा था उसका — “राष्ट्रवाद”।


हुआ कुछ यूं, कि धीरे -धीरे ‘अमुक’ धर्म-विशेष के खिलाफ दूसरे धर्म-विशेष के लोग, जिनको कि हम क़ानून के अनुसार ‘चमुक धर्म’ कह सकते हैं, पूरी तरह से गोलबंद हो गए। अब चूँकि ‘चमुक’ धर्म-विशेष के लोगों की संख्या ‘अमुक’ धर्म-विशेष के लोगों की संख्या से बहुत ज्यादा थी, तो जैसा कि स्वाभाविक था, नेताजी का सेक्कूल्लर’वाद खतरे में आ गया और जिसका डर था, वही हुआ। नेताजी अंततोगत्वा चुनाव हार गए।







उम्र के इस पड़ाव पर आकर किसी भी आदमी के आजीविका का इकलौता साधन एकाएक से ख़त्म हो जाए तो उस व्यक्ति पर क्या गुजरती है, मात्र वही व्यक्ति महसूस कर सकता है। मैं नेताजी के लिए वाकई दुखी था। नेताजी के पास गया। यथासंभव ग़मगीन चेहरा बना कर सहानुभूति के दो-चार बोल कहे, तो नेताजी का जबाब चौंकाने वाला था।
नेताजी बिलकुल निराश, हताश या परेशान नहीं थे। कहने लगे कि झाजी’ आप बड़े भोले (मूर्ख) हैं, अरे गीता में लिखा है कि जिसका पतन होता है उसका उत्थान भी तय होता है। मैंने गीता नहीं पढ़ी, पता नहीं उसमें यह लिखा भी है या नहीं, पर एक इतने प्रसिद्ध और सफल सेक्कूल्लरवादी होने के बावजूद गीता में उनकी ऐसी आस्था और इतना अडिग विश्वास देख कर मेरा मन श्रद्धा से भर उठा, सच कहूं तो आँखों में आंसू आ गए। थोड़ा और कुरेदने पर नेताजी ने अपनी इस आस्था के पीछे का अपना पूरा गणित भी समझाया।


कहने लगे कि झाजी आपने “हर घर से अफ़ज़ल निकलेगा” वाला नारा तो सुना है न ? मैंने सहमति में अपना सर हिलाया तो बोले, देखिए थोड़े ही दिनों की बात है, एक बार ज़रा ये जातीय जनगणना हो जाने दीजिए। इंशाअल्लाह, ऊपर वाले नारे की तरह ही हर जात से नए-नए नेता निकलने वाले हैं। आप तो जानते ही हैं कि मुझपर ऊपर वाले की सदैव विशेष कृपा रही है । मेरा अनुभव, मेरे पैसे और इतनी मिहनत से अर्जित अनेक दूसरे साधन भला किस दिन काम आएँगे !! राष्ट्रवादी चाहे जितना जोर लगा लें, इन नए वाले नेताओं में से कम से कम आधे को तो सेक्कुलर बना ही लूंगा, और फिर मेरे लिए “वही घोड़ा और वही मैदान”।


नेताजी से मिलने के बाद अब मैं भी पूरी तरह संतुष्ट हूँ कि “सेक्कूल्लर’वाद” भारत में फिर से लौटेगा। नेताजी के होते हुए भारत का सेक्कूल्लरवादी चरित्र पूरी तरह सुरक्षित है। जय हिन्द।

( श्री झा वरिष्ठ पत्रकार के साथ ही अधिवक्ता भी हैं)।

ये लेखक के निजी विचार है ।






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