पलटी मार (चाचा- भतीजा)

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कुमार राहुल

‘ चिराग दिल का जलाओ बहुत अंधेरा है ‘राजनीति में उच्च पदों पर बैठे नेता चराग दूसरों के लिए नहीं जलाते, वरना उनका घर खुद अंधकार में डूब जाएगा ।भाई रामविलास पासवान के मरने के साथ ही, पशुपतिनाथ पारस ने समझ लिया था, कि अब चिराग पासवान का राजनैतिक रसूख का चिराग बुझाने का वक्त आ गया है। इसलिए सभी सांसदों सहित पार्टी के मुखिया बन बैठे। जबकि लोक जनशक्ति पार्टी के पूर्व अध्यक्ष चिराग पासवान का कहना है, कि उन्हें और उनकी मां को लोक जनशक्ति पार्टी में रामविलास पासवान की विरासत संभालने का अवसर मिलना चाहिए।

हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी काफी सभाओ में कहते हैं, ‘तेरा नंबर कब आएगा’ ‘पारिवारिक पार्टी’ में दूसरे कार्यकर्ताओं का नंबर कभी नहीं आता, इसलिए पार्टी में जनाधार वाले नेता को पार्टी तोड़कर अलग रहा बनानी पड़ती है। वैसे पशुपतिनाथ पारस ( पारस को जनाधार वाला नेता के रूप में गिना नहीं जाता है )पहले नेता नहीं है, जिस ने पलटी मारी। लोक जनशक्ति पार्टी पहले से ही पलटी मार पार्टी रही है। स्वर्गीय रामविलास पासवान को श्री लालू प्रसाद यादव’ मौसम वैज्ञानिक’ कहते रहे हैं। रामविलास पासवान अपने पूरे करियर में अक्सर सत्ता पाने के लिए बेहतर अवसर वाली पार्टी के साथ गठबंधन या समझौता करते रहें, और सत्ता का सुख भोगते रहे ।

चाचा पारस ने भतीजा चिराग को धोखा इसलिए दिया, क्योंकि जदयू के प्रति उन्हें अपनी प्रगाढ़ता साबित करनी है। और जल्द ही मोदी कैबिनेट की विस्तार की संभावना है ।जिसमे रामविलास पासवान के मरने के बाद कैबिनेट में एलजीपी को एक मंत्री पद मिलने की संभावना है। इसलिए चाचा ने पार्टी के सभी सांसदों का समर्थन एवं अध्यक्ष पद हथिया कर खुद को दावेदार साबित कर दिया, और भतीजे को ठेंगा दिखा दिया।






‘साजिशें अभी से हैं, बागवानों( माली), गुलची ( भंवरा) में ,
अभी तो गुले बहार का पता ही नहीं ‘.

महाराष्ट्र के अजीत पवार वर्तमान उपमुख्यमंत्री कई बार अपनी ओछी हरकत और भाषणों के कारण सुर्खियों में रहे हैं। 2 वर्ष पहले अपने चाचा शरद पवार की पार्टी (NCP )को हाईजैक कर, देवेंद्र फडणवीस के साथ 2 दिनों वाली सरकार बना ली ।दो दिनों बाद फिर एनसीपी में लौट गए। यह राजनीतिक पलटी मारी का अभूतपूर्व नमूना था ।वर्तमान उपमुख्यमंत्री ने अपने भाषण में एक बार यहां तक कह दिया, कि अगर महाराष्ट्र में पानी की कमी है, तो मूत कर पानी की कमी पूरा करो।इसे कहते हैं,
‘अल्लाह मेहरबान तो, गधा पहलवान’ ।

उसी महाराष्ट्र में राज ठाकरे यानी शिवसेना के फायर ब्रांड नेता को अपनी पार्टी छोड़कर नयी पार्टी ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ‘बनानी पड़ी। लेकिन फायदे का सौदा साबित नहीं हुआ। हफ्ता वसूल पार्टी के नाम से मशहूर शिवसेना से अलग हुए राज ठाकरे कई बार हफ्ता वसूली के मामले में ईडी के दफ्तर के चक्कर काटते नजर आते हैं। जबकि चचेरे भाई उद्धव ठाकरे जिसने हिंदू पार्टी के नाम पर वोट पाया ,अपने धूर विरोधियों के साथ मिलकर मुख्यमंत्री की गद्दी संभाल रहे हैं ।भारतीय राजनीति मे अधिकांश पारिवारिक पार्टियों में ,चाचा ही भतीजे पर भारी पड़ते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश थोड़ा अलग है ।जहां अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल यादव की सारी महत्वाकांक्षा को पानी फेर कर पार्टी हथिया ली। दरअसल इसके पीछे भी मुलायम सिंह यादव का पुत्र मोह ही था। जिस ने बड़ी चालाकी से पहले बेटे को यूपी का मुख्यमंत्री बना दिया, जब पार्टी टूटी तो दिखावे के लिए भाई शिवपाल के साथ दिखे।






अब शिवपाल यादव की पार्टी का अस्तित्व यूपी में कहीं नजर ही नहीं आता । यह तो वही बात हुई ना..
जरूरत पड़ी तो खून हमने दिया ,
बहारें आई तो कहते हैं तुम कौन हो’
गनीमत यह है ,कि लालू प्रसाद यादव ने अपने भाइयों को एक्टिव पॉलिटिक्स में शामिल नहीं किया। बल्कि तरजीह अपने सालाओं को दी, जब सालों ने पलटी मारी तो, उसे हाशिए में ढकेल दिया गया। ठीक उसी तरह जैसे गांधी फैमिली में वरुण गांधी और उसकी मां को पार्टी से बाहर रखा। वैसे वरुण गांधी एक्टिव तो है, लेकिन असरदार नहीं दिखते हैं। लेकिन साउथ इंडिया की पारिवारिक पार्टी में उठापटक तुलनात्मक दृष्टि से कम ही दिखाई पड़ती है, करुणानिधि की पार्टी (DMK )में स्टालिन ने अपने भाई अलागिरी को येन केन प्रकारेण साइडलाइन कर दिया। जबकि मूरोसली मारन( करुणानिधि के रिलेटिव ) ने कभी भी सत्ता और सर्वोच्च पद पाने के लिए उठापटक नहीं की। अब सवाल यह है ,कि आज भी हम क्या राजतंत्र में जी रहे हैं? एक व्यक्ति संघर्ष कर अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाता है, तो क्या उन्हें यह अधिकार प्राप्त हो जाता है ,कि नए लोगों को रोक कर, अपने परिवार के लोगों को सत्ता में काबिज कराएं ।तो फिर नए संघर्ष करने वाले लोगों का नंबर कब आएगा ? इसके लिए दोषी हम सभी लोग हैं ,जो पारिवारिक राजनीतिक party को अपना मत देकर, सफलता की सीढ़ी चढ़ने में मदद करते हैं ।






बेशक वह व्यक्ति उस पद के काबिल ही ना हो। गलत व्यक्ति को चुनने के बाद, फिर हम उम्मीद करें, कि पद पाने के बाद वह अच्छा हो जाएगा।ऐसा हो ही नहीं सकता है ।हम सभी को धर्म, जाति ,परिवारवाद की राजनीति से ऊपर उठना पड़ेगा ,वरना अयोग्य व्यक्तियों की पारिवारिक राजनीतिक लड़ाई और सत्ता पाने की होड से समाज और देश का ही नुकसान होगा।






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